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Thursday, June 9, 2016

Error: The Local Security Authority cannot be contacted - Windows 2012 Server

If you are upgraded your server to Windows 2012 Server, you might get a "Local Security Authority" error while connecting remotely (through RDP). It comes specially when you are trying to access the server of a different domain with another domain's ID in AD Trust environment. For example if abc.com is in trust with xyz.com and you are trying to access any server in xyz.com with abc.com's account, you may get this error.

















The solution is quite simple. 

  • Login to the server with either local admin account or account of the same domain.
  • Go to My Computer's property and click on "Remote settings"










  • Disable "Allow connections only from computers running Remote Desktop with Network Level Authentication (recommended)" option by un-checking it.






















  • Click on "Apply" and try to login again with other domain's account. Bingo! Your issue is resolved.

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Sunday, February 14, 2016

“वैलेंटाइन डे” – जरुर मनाएं अगर आप उसे समझते है तो!

कई दिनों से मैं १४ फ़रवरी की प्रतीक्षा कर रहा था. इसलिए नहीं कि मुझे अपनी प्रेमिका को कोई विशेष उपहार देना था (वैसे मेरी कोई प्रेमिका है भी नहीं) बल्कि इसलिए ताकि मैं ये लेख बिलकुल सही समय पर आप तक पहुंचा सकूँ. पिछले कई दिनों से जहाँ देखो वहां इस विशेष दिन की चर्चा हो रही है. सभी लोग इस दिन कि प्रतीक्षा कर रहे थे, बस कारण अलग अलग था. युवा पीढ़ी जहाँ इसका इंतजार इस वजह से कर रही थी ताकि वे अपने प्रेमी अथवा प्रेमिका को ये बता सकें कि वे उनसे कितना प्रेम करते हैं. शिवसेना और बजरंगदल वाले इस ताक में थे कि इस दिन वे इस कुप्रथा के विरोध की आड़ लेकर फिर से अपनी राजनीति चमका सकें. मेरा कारण कुछ और है. मैं बस आप लोगों को एक कहानी सुनना चाहता हूँ. आशा है कि जब तक आप इस कहानी के अंत तक पहुंचेगे, कुछ लोग मुझसे सहमत होंगे और कुछ मुझे गलियां दे रहे होंगे. खैर, जो होगा देखा जाएगा. तो कहानी आरम्भ करते हैं.

कहानी यहाँ की नहीं है, कहानी है रोम की. कहानी हाल की भी नहीं है, कहानी है आज से करीब १७०० साल पहले की. कहानी है तीसरी शताब्दी की, सन २५० AD (ईसा की मृत्यु से लगभग २५० वर्ष पश्चात्) की. रोम का हमेशा से विश्व राजनीति एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है लेकिन ये कहानी रोम की राजनीति की नहीं बल्कि वह की संस्कृति की है. ये वो जमाना था जब रोम और लगभग पुरे यूरोप के लिए जीवन का अर्थ केवल अपनी वासनाओं की पूर्ति करना था. ये वो जमाना था जब रोम में शारीरिक सम्बन्ध कुछ अधिक हीं खुले रूप में स्वीकार किये जाते थे. एक पुरुष का कई स्त्रियों से और स्त्री का कई पुरुषों के साथ सम्बन्ध होना बहुत हीं आम बात थी. और “कई” का मतलब यहाँ दो चार साथी से नहीं है. स्वयं अरस्तु जैसे विचारक ने ये स्वीकार है कि अपने जीवनकाल में उनका लगभग २३ स्त्रियों के साथ सम्बन्ध रहा था. अब जब अरस्तु जैसे विद्वान की ये दशा थी तो आम लोगों के हालत का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं. कुल मिला कर बात ये थी कि रोम में नैतिकता की कोई जगह नहीं थी और पूरा का पूरा समुदाय केवल भोग विलास में डूबा रहता था.

उसी काल में एक संत हुआ करते थे. मुझे नहीं पता कि वे इस व्यवस्था को किस तरह देखते थे लेकिन कुछ समय पश्चात् उन महाशय को भारतीय दर्शन को पढने का अवसर प्राप्त हुआ. मैं ठीक ठीक तो नहीं बता सकता कि किस प्रकार वे भारतीय दर्शन को प्राप्त कर पाए लेकिन भारत का उन दिनों कई देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था खासकर मसालों के निर्यात की वजह से. कदाचित उस वजह से ही उन्हें ये मौका मिला हो. जब उन महाशय ने भारतीय दर्शन का अध्ययन किया तो वे अवाक् रह गए. उन्हें पता चला कि भारत में एक पुरुष किसी एक स्त्री के प्रति और एक स्त्री किसी एक पुरुष के प्रति समर्पित रहती हैं. वे इस बात को जान कर आश्चर्यचकित रह गए कि भारत में इस बात को निश्चित करने के लिए कि एक स्त्री एवं पुरुष एक दुसरे के प्रति इमानदार रहें, वहां एक सामाजिक व्यवस्था है जिसे “विवाह” कहते हैं. उनका चौंकना वाजिब हीं था क्योंके वे जिस समाज में रहते थे वहां के लोग केवल एक स्त्री अथवा प्रुरुष के प्रति गंभीर होने के विषय में सोच तक नहीं सकते थे. काफी गहनता से अध्यन करने के उपरांत उन्होंने ने पाया कि भारतीय संस्कृति का ये पहलू वाकई शानदार है. इसके कई फायदे उन्हें समझ में आये. मसलन इस व्यवस्था में यौन सम्बन्धी रोगों के होने की सम्भावना ना के बराबर थी. हम सभी ये जानते हैं कि आजकल एड्स और जितने भी प्रकार के यौन रोग हैं वे भारत के अपने नहीं हैं बल्कि सब के सब बाहरी दुनिया से हमारे देश में आये. दूसरी कमाल की बात ये थी कि भारतीय समाज में इस व्यवस्था के कारण सभी लोगों को अपने कुल एवं परिवार का ज्ञान होता था. आज भी हमें अपनी कई पीढ़ियों के बारे में पता होता है. चुकि यूरोप में शारीरिक संबंधों की कोई परिभाषा हीं नहीं थी इसी कारण ये पता करना असंभव था कि कौन किसकी संतान है और कौन किसका पिता, जो जाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति में संभव नहीं है.

उन महाशय को ये व्यवस्था इतनी पसंद आयी कि उस दिन के बाद से उन्होंने ये बात छोटी छोटी सभाएं कर आम जनता को बताना शुरू कर दर दिया. जैसी कि अपेक्षा थी अधिकतर लोगों ने उनका मजाक उडाया और उन्हें पागल तक करार दे दिया. कोई भी अपने आनंद की दुनिया से बाहर निकलना नहीं चाहता था. लेकिन इक्के दुक्के हीं सही लेकिन कुछ लोगों को उनकी बात समझ में आने लगी. चुकि वे एक पादरी थे इसीलिए जिन स्त्री अथवा प्रुरुष को उनकी बात समझ में आती थी, वे उनका विवाह अपने चर्च में करवा देते थे. उनका ये प्रयास समय के साथ साथ बढ़ता हीं गया और उन्होंने ऐसा एक दो साल नहीं बल्कि लगभग उन्नीस बीस सालों तक किया. इन सालों में रोम में विवाहित लोगों की तादात बहुत बढ़ी और उन्हें आदर्श बना कर सैकड़ों लोगों ने खुद आगे आकर इस व्यवस्था को अपनाया.

लेकिन कहते हैं ना कि अच्छी चीजों को बिना किसी मुसीबत के करते रहना बड़ा मुश्किल है. उन दिनों रोम पर “क्लोडियस” का शासन था. क्लोडियस रोम के सबसे क्रूर राजाओं में से एक माना जाता था. उसे एक दिन पता चला कि एक व्यक्ति घूम घूम कर विवाह जैसी प्रथा का प्रचार कर रहा है तो उसने उन महाशय को अपने राजदरबार बुलाया. उसने उनसे पूछा कि क्या कारण है कि वे रोम की संस्कृति को भ्रष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं. क्लोडियस के अनुसार जीवन केवल भोग-विलास के लिए था और वे महाशय विवाह को प्रचारित कर उनके भोग-विलास की सीमा को सीमित कर रहे थे. क्लोडियस ने उनसे अपना ये अभियान बंद करने को कहा किन्तु उन महाशय ने ये कहते हुए इससे इंकार कर दिया कि उस समय रोम के लोग किसी जानवर की भांति अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे और विवाह प्रथा उन्हें इंसान बनाने के लिए एक बेहतरीन शुरुआत थी. जैसी की उम्मीद थी, क्लोडियस ने उन्हें सरेआम फांसी देने का दंड सुनाया. सन १९५० तक यूरोप में फांसी की सजा सरेआम ही दी जाती थी. वैसा हीं हुआ. उन महाशय ने जिन जिन लोगों की शादियाँ करवाई थी उन सब की आँखों के सामने १४ फरवरी सन २६९ को उन महाशय को सूली पर चढ़ा दिया गया. उनका नाम था “संत वैलेंटाइन”.

वैलेंटाइन नहीं रहे लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था. उनके अनुयायियों ने उनकी बरसी के दिन “वैलेंटाइन डे” मानना शुरू कर दिया. उस दिन रोम में अगर किसी पुरुष को कोई महिला अथवा किसी महिला को कोई पुरुष पसंद आता था तो वे उनके पास जाकर उन्हें कहते थे “Will you be my Valentine?” इसका वास्तविक अर्थ होता था “क्या आप मुझसे शादी करेंगी अथवा करेंगे?” ये इतना बड़ा परिवर्तन था कि उस दिन के बाद से वैलेंटाइन डे धीरे-धीरे पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गया. समय बीता और पश्चिम की बांकी संस्कृतियों के साथ वैलेंटाइन डे ने भारत में प्रवेश किया, लेकिन किस रूप में ये बताने की कोई आवश्यकता नहीं है. भारत में करोडो लोग हर साल वैलेंटाइन डे मानते हैं किन्तु उसके पीछे कितना पवित्र उद्येश्य था उसका ज्ञान किसी को नहीं. कोई ये नहीं जानता और कोई ये जानना भी नहीं चाहता कि आखिर वो वैलेंटाइन डे मना किस लिए रहे है? सच तो ये है कि भारत में वैलेंटाइन डे केवल गुलाब, चॉकलेट्स और उपहारों तक हीं सीमित रह गया है.

ऐसा नहीं है कि वैलेंटाइन डे का इतिहास केवल मुझे मालूम है. गूगल पर खोजिये और आपको इसका पूरा इतिहास मिल जाएगा. श्री राजीव दीक्षित ने इसके बारे में एक सभा की थी पर अफ़सोस उसे मीडिया में जगह नहीं मिली. मिडिया के प्रति मेरा गुस्सा भी उनके दोतारफे रवैये के लिए है. जो मिडिया बड़े से बड़े राज को खोज लेती है वही मिडिया कभी भी इस दिन के पीछे की सच्चाई को नहीं दिखाती. दरअसल दिखा भी नहीं सकती. अगर सब लोग इस दिन के पीछे छुपे उद्येश्य को जान लेंगे तो वैलेंटाइन डे के नाम पे जो ये बेवकूफी हो रही है वो बंद हो जाएगी जिसका सबसे ज्यादा असर इससे होने वाले व्यापार पर पड़ेगा. और ये रकम कितनी बड़ी है उसका अंदाजा आप सिर्फ इससे लगा सकते हैं कि इस साल वैलेंटाइन डे पर केवल गुलाबों की बिक्री से करीब २००० करोड़ रूपये के व्यापार की सम्भावना है. सिर्फ गुलाबों से. बांकी उपहारों की कीमत का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं. सच हीं तो है, देश की संस्कृति से किसी को क्या लेना देना? संस्कृति भाड़ में जाये पर हजारों करोड़ का नुक्सान नहीं होना चाहिए.

आप सभी कृपया ये न समझें कि इस पोस्ट को लिखने का मेरा मकसद आपके वैलेंटाइन डे के आयोजनों को बर्बाद करना है. आप चाहे वैलेंटाइन डे मनाएं या इंडिपेंडेंस डे, उससे मेरा कोई लेना देना नहीं है. इस लेख को लिखने का मेरा मकसद केवल इतना है कि कम से कम आप इस विशेष दिन के पीछे छुपे विशेष मकसद को समझे. अगली बार जब आप किसी के कहने वाले हों “Will you be my Valentine?”, आपको पता होना चाहिए कि आखिर इसका मतलब क्या है. आजकल छोटे छोटे बच्चे अपने माता पिता तक को वैलेंटाइन कार्ड्स दे देते हैं. वे इसे क्या समझते हैं मुझे नहीं मालूम पर इस बेवकूफी को क्या कहें कुछ समझ में नहीं आता? प्रेमी प्रेमिका होना किसी भी तरह से गलत नहीं है लेकिन वैलेंटाइन डे सिर्फ गुलाब, चोकोलेट्स और उपहारों तक सीमित नहीं है. इसका वास्तविक अर्थ है सच्चा प्रेम और अपने प्रेम को विवाह का रूप देकर एक मंजिल तक पहुचाना. इस पोस्ट को पढने के बाद अगर कोई एक युगल भी वैलेंटाइन डे की असली भावना को समझ सका तो मैं समझूंगा इसे आपतक पहुचाना सार्थक रहा. अगर इस लेख में आपको थोड़ी भी सच्चाई दिखे तो कृपया इसे शेयर करें. यही आपकी सबसे बड़ी सहायता होगी.
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Sunday, December 13, 2015

How to remove Write Protection from your Pen Drive

We have often seen the write protection message in Pen Drive while we try to copy, move anything or try to format it. Specially if you have company's laptop, you will find such security as a part of the Corporate Security. You are reading this post it means you have also faced this problem and want to find a proper solution. Well, it's very simple. Let's do it:
  • Click on Start -> Run, enter "regedit" and press enter. It will open the registry editor.
 
  • Now go to "HKEY_LOCAL_MACHINE\SYSTEM\Currentcontrolset\control\storatedevicepolicies"At the right side, you will find DWORD Key naming "WriteProtect" with value "0x00000001 (1)".
  • Double Click on "WriteProtect" and change the value from "1" to "0" and click on OK.
  • You are done! Close the registry editor and reinsert your Pen Drive or reboot your system if required.
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Thursday, November 19, 2015

My experience while applying B1 VISA

15 days ago, I got a chance to apply for US B1 VISA from my current company (Wipro Technologies). Obviously, I was happy for that and I immediately completed all the formalities required for this. To apply B1 VISA, we mainly need 4 documents:
  1. Your original passport (current and all previous passports).
  2. DS-160 form which can be filled online (https://ceac.state.gov/genniv). We only need the printout of the DS-160 confirmation page.
  3. Client Invitation Letter which should come from your client in US:
    • Should be written in client’s Letter Head (not your company’s letter head).
    • Should be an individual letter, mentioning your name only, not a group invitation.
    • Duration of your stay (preferably 3 weeks) should be mentioned.
    • Weekly agenda of your visit. Please make sure, not to mention any words like “Work, Duty, Roles, Responsibility, Salary, Compensation” etc. Your agenda should clearly reflect that you are going for Business purpose or meetings, not for employment.
  4. Appointment confirmation letter with US embassy from your employer.
Apart from these things, you may have other formalities depending upon company to company such as additional trainings and mock session etc. After few days you will get the appointment confirmation from your company. It has two parts:
  1. OFC appointment: They will take your snap, fingerprints and stamp your DS-160 form as confirmation and stick a biometric confirmation code on your passport.
  2. Consular appointment: You have to go to US embassy for interview along with stamped DS-160 form and passport with biometric confirmation code.

Everything was absolutely fine until I got my OFC (16.11.2015) and Consular (17.11.2015) appointments. I don’t know what happened but I became so nervous. I already knew everything what’s going to be happen and what all questions will be asked but still I was eagerly waiting for my appointment date. Not because I will get the VISA, but because I wanted to get rid of my nervousness.

Finally 16th November arrived and I went to the Hyderabad OFC center. First the associates checked my passport, DS-160 form and appointment confirmation letter. After that I went inside for security check and then they stick biometric confirmation code on my passport. They have given me a token and send me inside to wait for the fingerprint. I didn’t have to wait for so long and my turn arrived. I went to the respective counter where the officer (Indian) asked my purpose of visit. After that he took my photo and fingerprints (both hands). Finally he stamped my DS-160 form and I was done for the day. The entire process took around 30 minutes.

When I came back, I became more nervous for the next day interview. I did everything to prepare well. I did mock session in front of mirror again after again which made me confident but equally worried. I didn’t know what will happen tomorrow? I was so nervous that I couldn’t sleep even for a minute. Just imagine, next day I have to go for VISA interview where I have to look fresh and energetic, but I woke up entire night. Every second was like hell for me. Still I don’t understand what happened to me. I never ever faced such a feeling in my entire life even in worst scenario. 

Well, the big day came. On 17th morning 8:00:00 AM I took a cab and reached the US consulate Hyderabad by 08:30:00. My appointment was at 10:00:00 AM. I thought what will do for next 90 minutes but fortunately I came to know that they have started the entry from 08:00:00 AM. I joined the queue and they checked my passport and DS-160 form. After 30 minutes, I was inside the US consulate.

There they asked me to wait and then given a small container to pullout everything (wallet, belt, watch, hanky) including my documents. I didn’t carry my phone as it’s not allowed inside. After security check, I went inside and they again asked me to wait. Around 30 minutes later, they told me to go to a counter where they again took my fingerprint and matched it with my previously given fingerprints in OFC. After that they asked me to wait in a waiting area for the final interview. After 30 minutes of wait, they have given me a token of counter no 11 and I was finally reached at the interview section.

I was the 7th person in the queue and was trying my best, not to concentrate what’s going on to other people but that was impossible. Six people before me got VISA rejection back to back and I can’t explain my state of mind that time. I was completely hopeless but I revived myself and finally reached the counter.

Nilabh: Hi, good morning.

Interviewer: Very good morning. How are you doing?

Nilabh: I am good. How about you?

Interviewer: I am doing well. Thank you! So you are Mr. Nilabh?

Nilabh: Yes

Interviewer: You work as Sr. Administrator in Wipro?

Nilabh: yes

Interviewer: How long you will stay there?

Nilabh: 3 weeks

Interviewer: Your purpose of visit?

Nilabh: I have to meet few stakeholders to discuss the upcoming IT plans.

Interviewer: What kind of IT plans?

Nilabh: Actually my client “ABC” has acquired a company “XYZ” and they are planning to merge their IT infrastructure. I have to meet few application owners to discuss how we can do it from offshore, Hyderabad.

Interviewer: Congratulations! Your VISA is approved.

Nilabh: Thanks a lot!

The interview last hardly for 30 seconds. After that I didn’t see anything and immediately came out of the consulate. I hold my breath for few seconds and realized that my passport is not with me because my VISA is approved. And you can imagine the very next thing which I would have been done. Yes you are right, I went to sleep.
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Sunday, May 3, 2015

Happy to say - Bye bye Flipkart

Hi Friends!

Don't know after how many days or months I am writing this post (sspecially in English) but something happened which forced me to write this post. First of all let me clear this that the title of this post is real and I am not going to use Flipkart anymore from now on. Confused? Let me clarify this. And yes, I assure you that even if you are a hardcore Flipkart fan, you have to agree with these facts. So let's begin.

I remember 2009 (6 years ago) when I first came to know about Flipkart and I was very excited about online shopping concept. That time if you place an order of more than INR 200/-, your delivery used to be free. I am sure those who are using flipkart since last 2-3 years will agree with this fact. Seriously guys, I have placed many orders on Flipkart just to save delivery charges.

Then time changes and Flipkart becomes a brand by now. I have observed few amazing things but before that, I am going to give you all guys an exercise. Don't simply trust me as I may be a liar so better do your own stuff. I want you to open Flipkart.com in your next tab and validate what I am saying.

Just go to Flipkart and try to open any category (and I mean ANY). No no... Don't stop. Open other categories too. I want you to see at-lease five products in different categories. Did you find anything unusual? Really? Not yet? Ok just have a look on these images:




























Do you find anything special? Ok let me make it easier. Just look at the "Sold By" area which I have highlighted. Ohh... Now picture is bit clear. This is just a 5 different categories but you search in any category, you will find the cheapest price by an ONLY great company "WS Retails". Isn't it weird that one company is selling mobile, computer, cloths, footwear, consumer durables.... EVERYTHING on a lowest price and still we are unaware of that company. Also if anyone of you ever got free coupon for Flipkart, you must have observed that your coupon will be valid only for products sold by "WS Retails". So who is this "WS Retails"? Simple answer, it's a fraud.

The reality is all of us, small merchandisers put their products on Flipkart and pay assuming our sales will increase but practically your listings are there just to increase the traffic. Ultimately product has to be sold by "WS Retails" as its price will be the least. And sir, the difference will be so high that you will not even think to choose other vendors. Basically "WS Retails" is a SCAM owned by Flipkart. See how easy it is to make us fool! I also found a nice article about "WS Retails":

Link: http://www.mouthshut.com/review/Flipkart-com-review-ssrsuuqnsr

Now something happened last week and today that I am writing this post. Few years back Flipkart suddenly increased the minimum order from INR 200/- to INR 500/- which we all can understand but see what Flipkart is doing now. Now if you order multiple items in Flipkart, it will charge delivery charges on every product, no matter you are placing an order of INR 5000/-. Also the minimum delivery charges will be INR 60/- and it's really sad to see delivering charge INR 100/- for a book worth INR 215/-.

Now just have a look on below images clearly tell you how Flipkart is looting us. It's just a comparison of same products in Flipkart and Amazon.


























Now finally, my last mail to Flipkart:


Hi,



First of all thank you to let me search other options in online shopping. I am very old customer of Flipkart but in recent time, you have truely started looting the customer. I have tried to order multiple items and I was amazed to see that the delivery charges are there for every individual items. That is really pathetic to pay INR 100/- as a delivery charge for INR 215/- book (Asura - Hindi). Minimum delivery chagrges was INR 60/-. I have ordered the same thing from Amazon in less than 50% of your price. How amazing is this?


Also please stop playing tricks with your customer to sell almost every items through "WS Retails". Everyone knows it's your venture.

Anyhow, don't want to strech this issue too much. Just want to say Goodbye. I am really happy to say goodbye to Flipkart. And yes, I am writing a blog regarding this and will surely share the link. I hope someday I will see the old and genuine Flipkart again.

Thanks!
Nilabh
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Sunday, January 4, 2015

How to install .Net Framework 3.5 in Windows 2012 Server?

If you have an application that you want to run on Windows Server 2012 that requires the .NET Framework 3.5 (like Microsoft Exchange Server 2010), you will most likely run in to a problem when trying to install it. If you are trying to install .NET Framework 3.5 from the Server Manager GUI, you will see this when installing the feature:

“Do you want to specify an alternate source path? One or more installation selections are missing source files…”







To solve this, you can either:

1. Go to a command prompt and enter this:

dism /online /enable-feature /featurename:NetFX3 /all /Source:d:\sources\sxs /LimitAccess

Note: D: is the source location. 2012 DVD most of the time.












2. Go down to “Specify an alternate source path” and enter “d:\sources\sxs” as the path.



























































Now you should see this under your Features list:

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Sunday, June 1, 2014

जानिए आखिर क्या है धारा ३७०

आजकल संविधान की धारा ३७० सुर्ख़ियों में है. आइये जानते हैं कि आखिर धारा ३७० है क्या?

धारा ३७० (अंग्रेजी में आर्टिकल 370) ही जम्मू एवं कश्मीर राज्य को सम्पूर्ण भारत में अन्य राज्यों के मुकाबले विशेष अधिकार (विशेष दर्ज़ा) दिलाता है. भारतीय संविधान में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध सम्बन्धी भाग २१ का अनुच्छेद ३७० जवाहरलाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से तैयार किया गया था. जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय करना ज़्यादा बड़ी ज़रूरत थी और इस काम को अंजाम देने के लिये धारा ३७० के तहत कुछ विशेष अधिकार कश्मीर की जनता को दिये गये थे जो इस प्रकार हैं:
    • धारा ३७० के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित क़ानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिये. 
    • इसी विशेष दर्ज़े के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा ३५६ लागू नहीं होती जिस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्ख़ास्त करने का अधिकार नहीं है.
    • १९७६ का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता जिसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है. यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते.
    • भारतीय संविधान की धारा ३६०, जिसके अन्तर्गत देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती. 
    •  जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है. 
    • जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रध्वज अलग होता है.
    • जम्मू - कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल ६ वर्षों का होता है जबकि भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल ५ वर्ष का होता है. 
    • जम्मू-कश्मीर के अन्दर भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं होता है. 
    • भारत के उच्चतम न्यायालय के आदेश जम्मू-कश्मीर के अन्दर मान्य नहीं होते हैं. 
    • भारत की संसद को जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में अत्यन्त सीमित क्षेत्र में कानून बना सकती है. 
    • जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से विवाह कर ले तो उस महिला की नागरिकता समाप्त हो जायेगी. इसके विपरीत यदि वह पकिस्तान के किसी व्यक्ति से विवाह कर ले तो उसे भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जायेगी. 
    • धारा ३७० की वजह से कश्मीर में RTI लागू नहीं है, RTE लागू नहीं है, CAG लागू नहीं है. संक्षेप में कहें तो भारत का कोई भी कानून वहाँ लागू नहीं होता.
    • कश्मीर में महिलाओं पर शरियत कानून लागू है. 
    • कश्मीर में पंचायत के अधिकार नहीं हैं.
    • कश्मीर में चपरासी को केवल २५०० रूपये ही मिलते है जो कि अन्य राज्यों के मुकाबले अत्यंत कम हैं.
    • कश्मीर में अल्पसंख्यकों (हिन्दू, सिख) को १६% आरक्षण नहीं मिलता. 
    • धारा ३७० की वजह से कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते हैं.
    • धारा ३७० की वजह से ही कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी भारतीय नागरिकता मिल जाती है. दुसरे विकल्प के तौर पर कोई भी पाकिस्तानी नागरिक किसी कश्मीरी लड़की से शादी कर भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकता है.
    अब ये भारत की जनता को सोचना है कि क्या वाकई धारा ३७० का कोई अस्तित्व रहना चाहिए या इसे समाप्त कर देना चाहिए.
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    Tuesday, May 27, 2014

    आखिर हिंदी साहित्य का भविष्य कहाँ जा रहा है?

    आपने विद्यालय के दिनों को याद करता हूँ तो चेहरे पे अनायास हीं एक मुस्कान आ जाती है. जब हम नयी कक्षा में जाते थे तो नयी पुस्तकों के प्रति जबरदस्त उत्कंठा रहती थी. मुझे याद है कि जैसे हीं नयी कक्षा की पुस्तकें आती थी तो सबसे पहला काम होता था हिंदी की पुस्तक को पृष्ठ दर पृष्ठ ख़त्म करना. आप लोगों को भी शायद वो दौर याद होगा जब हमारी हिंदी की पुस्तकों में एक से बढ़कर एक रचनाकारों की कहानियां और कवितायेँ हुआ करती थी. आज अगर प्रेमचंद, शरतचंद्र, जयशंकर प्रसाद, फणीश्वर नाथ रेणु, महादेवी वर्मा, रविन्द्रनाथ ठाकुर, अज्ञेय, निराला और भी ना जाने कितने कालजयी साहित्यकार जन जन के चहेते हैं तो इसका एक बड़ा कारण वे पुस्तकें भी हैं जो हमने अपने बचपन के दिनों में पढ़ी थी.

    उन दिनों जब हम पुस्तकालय में जाते थे तो चारो ओर सजी हिंदी पुस्तकों को देख कर मन प्रसन्न हो जाता था. अंग्रेजी साहित्य में हमें ना ज्यादा रूचि थी और ना हीं ज्यादा ज्ञान. अंग्रेजी स्कूल काफी कम हुआ करते थे किन्तु अगर आप उन विद्यालयों के पुस्तकालयों में भी अगर जाते तो वहाँ भी आपको हिंदी पुस्तकों की प्रचुरता हीं मिलती थी. उन दिनों अंग्रेजी पुस्तकों का मतलब हुआ करता था अंग्रेजी व्याकरण की पुस्तकें अथवा पाश्चात्य साहित्यकारों की प्रसिध्द कृतियाँ. हालाँकि उनके भी हिंदी अनुवाद हीं अधिक प्रचलित थे. उन दिनों अगर कोई व्यक्ति अंग्रेजी साहित्य पढता हुआ दिख जाता था तो उसके केवल दो हीं निष्कर्ष निकलते थे: एक, वो व्यक्ति बहुत हीं अधिक शिक्षित है और दूसरा, वो पुस्तक किसी महान पाश्चात्य रचनाकार की कृति है. कुल मिलाकर कहा जाए तो उस समय पुस्तक का मतलब होता था "हिंदी पुस्तक". 

    आज जब ये सब सोचता हूँ तो लगता है जैसे समय का चक्र पूरा उल्टा घूम चुका है. हिंदी पुस्तके? वो होती हैं क्या? हिंदी माध्यम के विद्यालय? अभी भी चल रहे हैं क्या? ऊपर उल्लेखित लेखक? कौन हैं वे? मजेदार बात ये हैं कि शायद आपको आज कई अंग्रेजी स्कूल में प्रेमचंद की कहानियां मिल जाएंगी किन्तु छात्र ये नहीं जानते कि प्रेमचंद दरअसल थे कौन और हिंदी साहित्य में उनका क्या योगदान है? उनके लिए प्रेमचंद की कहानी सिर्फ एक कहानी है. उनकी दृष्टि में प्रेमचंद और शेक्सपियर में कोई अंतर नहीं है. पाश्चात्य संस्कृति में रंगे कुछ छात्र इस बात से रुष्ट हैं कि जिस पुस्तक में शेक्सपियर, जॉर्ज बनार्ड शॉ और रस्किन बांड जैसे साहित्यकारों की कृतियाँ है वहाँ प्रेमचंद कहाँ से आ गए? मैं इस विषय को ज्यादा नहीं खीचना चाहता किन्तु कुछ चीजें तो हैं जो आप भी अपने प्रतिदिन के जीवन में देखते होंगे. 

    आज अगर कोई व्यक्ति हिंदी की पस्तक पढता दिख जाए तो उसका भी दो मतलब निकलता है: पहला, ये व्यक्ति अंग्रेजी भाषा नहीं जानता और दूसरा, ये काफी पुराने विचारों का व्यक्ति है मतलब हम लोगों की तरह आज के नए ज़माने का नहीं है. मैं प्रतिदिन मेट्रो में सफ़र करता हूँ और वहाँ आपको कई लोग मिल जाएँगे जो अपने समय का सदुपयोग पुस्तक पढ़कर करते हैं किन्तु हिंदी पुस्तक पढता हुआ आपको कोई विरला हीं मिलेगा. ऑनलाइन जाइए, पुस्तकों को सर्च कीजिये, १००० अंग्रेजी पुस्तकों पर आपको एक हिंदी की पुस्तक मिलेंगी. कानौट प्लेस जाइए, हर २०० मीटर पर आपको पुस्तक बेचने वाले मिल जाएँगे पर एक भी हिंदी पुस्तक आपको नहीं मिलेगी. स्टेशन चले जाइये, हर कदम पर पुस्तक की दुकान दिख जाएगी किन्तु हिंदी पुस्तकों का अनुपात नगण्य होगा. किसी भी पुस्तकालय में चले जाएँ, अब वहाँ आपको हिंदी पुस्तकों का एक छोटा सा कोना नजर आएगा जो अंग्रेजी पुस्तकों की भीड़ में जैसे कोई हुई सी नजर आती है. नए ज़माने के ऐसे २० साहित्यकार का नाम आपको मालूम होगा जो अंग्रेजी में लिखते हैं पर दिमाग पर पर्याप्त मात्र में जोर देने पर भी २ ऐसे व्यक्ति का नाम आपको नहीं याद आएगा जो हिंदी में लिखते हैं. आज हर दिन अंग्रेजी भाषा का एक प्रतिभाशाली और प्रसिध्द लेखक जन्म लेता है किन्तु हिंदी का आखिरी प्रसिध्द लेखक कौन था, ये सोचने में आपको काफी समय लगेगा. बाज़ार में अंग्रेजी के बेस्ट सेलर्स की बाढ़ सी आई हुई है लेकिन एक भी हिंदी पुस्तक आपको नहीं मिलेगी जिसे पर्याप्त पाठक भी मिल सके. नए लेखकों को तो छोड़ दें, हिंदी साहित्य की स्थिति इतनी भयावह है कि प्रसिध्द और स्थापित हिंदी लेखकों ने भी जैसे लिखना छोड़ दिया है. नरेन्द्र कोहली और अशोक चक्रधर जैसे लेखकों ने लम्बे समय से कुछ नया नहीं लिखा है. 

    दुःख होता है किन्तु कारण समझ से परे है. सीधा साधा जवाब ये है कि जब हिंदी के पाठक हीं नहीं हैं तो हिंदी की पुस्तकें और लेखक कहाँ से आयेंगे किन्तु ये परिस्थितियां कब, कैसे और क्यों उत्पन्न हुई, कोई बता नहीं सकता. 

    कुछ दिनों पहले मैंने एक हिंदी उपन्यास "स्वयंवर" लिखा था. उसका क्या हश्र हुआ होगा ये बताने की जरुरत नहीं है. जब मैं प्रकाशक के साथ अनुबंध कर रहा था तो ऐसा लग हीं नहीं रहा था जैसे उन्हें कोई भी उत्साह हो. उनकी मनोदशा ऐसी थी जैसे वे बेमन से कुछ कर रहे हों और ये स्थिति तब थी जब प्रकाशक को पुस्तक के लिए सारा खर्चा मैंने अपनी जेब से दिया था. मैं खुश था कि भारत के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक मेरी पुस्तक को छापने के लिए तैयार हो गयी है लेकिन जब पुस्तक बाज़ार में आई तो प्रचार के नाम पर प्रकाशक का प्रयास शून्य था. किसी भी तरह से उन्होंने मेरी पुस्तक को प्रचारित करने की आवश्यकता नहीं समझी. मैं कितना निराश हुआ ये मैं बता नहीं सकता. जहाँ वे अंग्रेजी के सामान्य पुस्तकों को भी जोर शोर से प्रचारित कर रहे थे वही मेरा उपन्यास उपेक्षित पड़ा रहा. किस लिए? क्योंकि वो हिंदी में था. काश वे मेरी पुस्तक के लिए कुछ तो करते. केवल एक प्रयास! वो भी मेरे लिए पर्याप्त था. कुछ दिनों पहले जब मैंने अपनी पुस्तक की प्रतिक्रिया के बारे में प्रकाशक से पूछा तो उन्होंने बड़े दुखी मन से मेरी पुस्तक की असफलता के बारे में मुझे बताया. शायद उन्हें मेरी पुस्तक को लेकर अपने फैसले पर अफ़सोस था. फिर से बता दूं कि ये तब था जब प्रकाशक के जेब से एक फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं हुई. मेरी जेब से केवल पैसा हीं नहीं गया बल्कि मेरी पूरी मेहनत व्यर्थ चली गयी. संतोष की बात ये रही कि जिन लोगों ने मेरी पुस्तक पढ़ी, उन्होंने बेहतरीन प्रतिक्रिया दी और पाठकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया से अधिक महत्वपूर्ण मेरे लिए और कुछ नहीं है चाहे वो केवल एक हीं पाठक हो. 

    कुछ लोगों ने मुझे कहा कि मैंने हिंदी में पुस्तक लिख कर गलती कर दी. अगर मैंने यही पुस्तक अंग्रेजी में लिखी होती तो मुझे जबरदस्त प्रतिक्रिया मिलती. कुछ लोगों ने मुझे अपने उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद करवाने का भी सुझाव दिया. सुनकर दुःख भी हुआ और हंसी भी आयी. जिस पुस्तक की पूरी पृष्ठभूमि हीं हिंदी हो उसे अंग्रेजी में कैसे लिखा जाये. जरा सोच कर देखिये कि अगर प्रेमचंद केवल प्रसिद्धी पाने के लिए अंग्रेजी भाषा में लिखते तो क्या वे कलम के सिपाही कहलाते? क्या केवल प्रसिद्धी पाने के लिए किसी पुस्तक की आत्मा को मार देना उचित है? 

    क्या मैं आगे कोई पुस्तक लिखूंगा? अवश्य.

    क्या मैं अपनी इस गलती से सबक लेते हुए उसे अंग्रेजी में लिखूंगा? बिलकुल नहीं क्योंकि मेरे लिए ये कोई गलती नहीं है जिससे मैं सबक ले सकूँ. अगर पाठक पुस्तक की श्रेष्ठता का पैमाना भाषा को मानते हैं तो यही सही. ये मेरी ओर से भी लागू होता है. मेरी पुस्तक की आत्मा हिंदी है और सिर्फ कुछ लाभ के लिए मैं पाठकों के सामने मृत रचना नहीं रख सकता. 

    मैं बस उन नवोदित एवं स्थापित लेखकों का आव्हान करना चाहता हूँ जो हिंदी भाषा में लिखने के लिए कटिबद्ध हैं. घबराएँ नहीं, चाहे हिंदी पढने वाले मुट्ठी बार लोग हीं क्यों न हों, पर उनके सामने सजीव और श्रेष्ठ रचना रखना हमारी जिम्मेदारी है. पुस्तकों का चाहे कितना भी व्यापारीकरण हो जाये किन्तु हिंदी के यथार्थ पाठकों का एक समूह है और हमेशा रहेगा. हमें बस उस समूह को विस्तारित करना है और हमेशा ऐसी कृतियों को सामने लाना है जो हिंदी साहित्य में एक मिसाल हो. आज जो प्रकाशक हिंदी साहित्य से नजरें चुराते फिर रहे हैं उन्हें वो दिन भी देखना पड़ेगा जब पाठक अपनी मातृभाषा की ओर फिर से मुड़ेंगे और उस समय अंग्रेजी उनकी सहायता नहीं कर पायेगी और वे हमारी ओर ललचाई दृष्टी से देखेंगे.

    मित्रो, हिंदी की वर्त्तमान परिस्थितियां अत्यंत चिंतित करने वाली हैं. आवश्यकता इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा लोग आगे आयें और हिंदी को बढ़ावा दें. ना केवल रचनाकार बनकर बल्कि एक शुध्द पाठक बनकर और उनकी कृतियों को प्रोत्साहित कर के भी, अन्यथा कहीं ऐसा ना हो कि हिंदी साहित्य केवल एक इतिहास बन कर रह जाए.
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    Tuesday, February 18, 2014

    विश्व पुस्तक मेले में "स्वयंवर"

    विश्व पुस्तक मेले में "स्वयंवर"
    जब मैं "स्वयंवर" लिख रहा था तो कभी सोचा नहीं था की कुछ पल ऐसे भी आयेंगे जो अविस्मर्णीय होंगे. मैंने कभी स्वयंवर के लिए कोई मापदण्ड तय नहीं किया था और ना हीं इसके कोई लम्बी चौड़ी अपेक्षा हीं रखी थी. हाँ मैं कुछ ऐसा जरुर चाहता था जो मुझे कुछ ख़ुशी दे सके. कमाल की बात ये है कि ऐसी कई चीजें हुई जिसने मुझे ग़जब का आत्मविश्वास दिया. पिछले कुछ दिनों में मैं अपने पुस्तक के सिलसिले में कुछ ऐसे लोगों से मिला जिनसे मिलना मेरा स्वप्न था. किन्तु आज यहाँ पर मैं उन सभी चीजों के बारे में नहीं लिखने वाला हूँ पर हाँ, मैं उन सभी घटनाओं के बारे में लिखे बिना रह भी नहीं सकता. आने वाले कुछ समय में उनके बारे में अवश्य लिखूंगा.

    फिलहाल उस एक क्षण के बारे में बता दूँ जो मेरे लिए विशिष्ट थे. पिछले हफ्ते (१६ जनवरी २०१४) मेरा परममित्र प्रकाश मुझसे मिलने आया. उसके बारे में बस ये बताना उचित होगा कि वो स्वयं हिंदी का परमप्रेमी और ज्ञाता है और उसे ये ज्ञान उसके परिवार से विरासत में मिला है. उसने अचानक मुझसे "विश्व पुस्तक मेले" में चलने को कहा. सच कहूँ मेरी बिलकुल भी इच्छा नहीं थी पर उसकी जिद के आगे मेरी एक भी नहीं चली. बाद में पता चला कि उसकी ये जिद मुझे कितनी ख़ुशी देने वाली थी.

    दिल्ली में पिछले हफ्ते विश्व पुस्तक मेले का आयोजन हुआ जो अगले हफ्ते तक चलने वाला है. बड़ी विडंबना है कि आज से पहले मैं कभी किसी पुस्तक मेले में नहीं गया खासकर इस प्रकार के विश्वस्तरीय आयोजन में. ओह! क्या माहौल था. वहां उमड़ी भीड़ को देखकर बड़ा संतोष हुआ कि भारत में अभी तक पुस्तक प्रेमियों की बहुयात है. हम दोनों ने वहां के एक एक पल को सहेजा या यूँ कहूँ कि एक एक पल को जिया. हम दोनों बड़े पशोपेश में थे कि कौन सी पुस्तक खरीदें कौन सी नहीं. समय का आभाव तो था हीं, पैसों का कुछ ज्यादा हीं आभाव था पर भी हम दोनों ने कुछ पुस्तकें खरीदी.

    विश्व पुस्तक मेले में "स्वयंवर"
    फिर हमलोग डायमंड बुक्स के स्टाल पर पहुंचे और हमारी नजर सामने शेल्फ पर पड़ी जहाँ हमें स्वयंवर के दर्शन हुए. उस समय की मनोदशा का वर्णन करना बड़ा मुश्किल है. लगा जैसे इस पुस्तक को लिखने का श्रम सार्थक हो गया. मुझे नहीं पता कि पाठकों को स्वयंवर के बारे में पता भी है या नहीं, खरीद रहा है भी या नहीं पर मेरे लिए विश्व पुस्तक मेले जैसे मंच पर उसकी उपस्थिति हीं पर्याप्त है. बड़ा हीं सुखद अनुभव था. 

    उस दिन मन ऐसा रमा कि अगले दिन हम फिर वहां पहुँच गए और उस दिन तो कमाल हो गया. अभी नहीं पर जल्द हीं उसके बारे में बात करूँगा. अंत में उसका धन्यवाद् जरुर करूँगा जिसकी वजह से ये संभव हुआ. अपनी पुस्तक के लिए शायद मैं उतना उत्साहित नहीं था जितना वो था. प्रकाश, बहुत धन्यवाद्.
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    Monday, February 10, 2014

    Press Release, Sobhasaria Group of Institutions, Jaipur, 24.01.2014

    Dainik Bhaskar

    Press Release, Dainik Bhaskar, Sobhasaria Group of Institutions, Jaipur, 24.01.2014




















    Dainik Bhaskar (ePaper)

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    Rajasthan Patrika

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