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Monday, May 31, 2010

ऑपरेटिंग सिस्टम

ऑपरेटिंग सिस्टम एक सिस्टम सॉफ्टवेयर है, जो कम्प्यूटर सिस्टम के हार्डवेयर रिसोर्सेस, जैसे-मैमोरी, प्रोसेसर तथा इनपुट-आउटपुट डिवाइसेस को व्यवस्थित करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम व्यवस्थित रूप से जमे हुए साफ्टवेयर का समूह है जो कि आंकडो एवं निर्देश के संचरण को नियंत्रित करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम, कम्प्यूटर सिस्टम के प्रत्येक रिसोर्स की स्थिति का लेखा - जोखा रखता है तथा यह निर्णय भी लेता है कि किसका कब और कितनी देर के लिए कम्प्यूटर रिसोर्स पर नियंत्रण होगा। एक कम्प्यूटर सिस्टम के मुख्य रूप से चार घटक हैं
  • हार्डवेयर
  • ऑपरेटिंग सिस्टम
  • एप्लीकेशन प्रोग्राम
  • यूजर्स
आपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकता: आपरेटिंग सिस्टम हार्डवेयर एवंसाफ्टवेयर के बीच सेतु का कार्य करता है कम्पयुटर का अपने आप मे कोई अस्तित्व नही है। यह केवल हार्डवेयर जैसे की-बोर्ड, मानिटर, सी.पी.यू इत्यादि का समूह है आपरेटिंग सिस्टम समस्त हार्डवेयर के बिच सम्बंध स्थापित करता है आपरेटिंग सिस्टम के कारण ही प्रयोगकर्ता को कम्युटर के विभिन्न भागो की जानकारी रखने की जरूरत नही पडती है साथ ही प्रयोगकर्ता अपने सभी कार्य तनाव रहित होकर कर सकता है यह सिस्टम के साधनो को बांटता एवं व्यवस्थित करता है। आपरेटिंग सिस्टम के कई अन्य उपयोगी विभाग होते है जिनके सुपुर्द कई काम केन्द्रिय प्रोसेसर द्वारा किए जाते है। उदाहरण के लिए प्रिटिंग का कोई किया जाता है तो केन्द्रिय प्रोसेसर आवश्यक आदेश देकर वह कार्य आपरेटिंग सिस्टम पर छोड देता है और वह स्वयं अगला कार्य करने लगता है।  इसके अतिरिक्त फाइल को पुनः नाम देना, डायरेक्टरी की विषय सूचि बदलना, डायरेक्टरी बदलना आदि कार्य आपरेटिंग सिस्टम के द्वारा किए जाते है।
इसके अन्तर्गत निम्न कार्य आते है
  • फाइल पद्धति: फाइल बनाना, मिटाना एवं फाइल एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना। फाइल निर्देशिका को व्यवस्थित करना।
  • प्रक्रिया: प्रोग्राम एवं आंकडो को मेमोरी मे बाटना एवं प्रोसेस का प्रारंभ एवं समानयन करना। प्रयोगकर्ता मध्यस्थ फाइल की प्रतिलिपी, निर्देशिका, इत्यादि के लिए निर्देश, रेखाचित्रिय डिस्क टाप आदि.  
  • इनपुट/आउटपुट: मोनिटर प्रिंटर डिस्क आदि के लिए मध्यस्थ.
विशेषताएं
  • मेमोरी प्रबंधन: प्रोग्राम एवं आकडो को क्रियान्वित करने से पहले मेमोरी मे डालना पडता है अधिकतर आपरेटिंग सिस्टम एक समय मे एक से अधिक प्रोग्राम को मेमोरी मे रहने की सुविधा प्रदान करता है आपरेटिंग सिस्टम यह निश्चित करता है कि प्रयोग हो रही मेमोरी अधिलेखित न हो प्रोग्राम स्माप्त होने पर प्रयोग होने वाली मेमोरी मुक्त हो जाती है। 
  • मल्टी प्रोग्रामिंग: एक ही समय पर दो से अधिक प्रक्रियाओ का एक दूसरे पर प्रचालन होना मल्टी प्रोग्रामिंग कहलाता है। विशेष तकनिक के आधार पर सी.पी.यू. के द्वारा निर्णय लिया जाता है कि इन प्रोग्राम मे से किस प्रोग्राम को चलाना हैएक ही समय मे सी.पी. यू. किसी प्रोग्राम को चलाता है आउटपुट प्रभाग सम्पन्न हुए प्रोग्राम का परिणाम सी.पी.यू से प्राप्त करता है तथा इनपुट प्रभाग किसी अन्य प्रोग्राम को सी . पी. यू मे प्रवेश कराता है। इस प्रकार इस प्रक्रिया मे सी.पी.यू का सभी भाग पूर्ण रूप से व्यस्त रहता है।  
  • मल्टी प्रोसेसिंग: एक समय मे एक से अधिक कार्य के क्रियान्वयन के लिए सिस्टम पर एक से अधिक सी.पी.यू रहते है। इस तकनीक को मल्टी प्रोसेसिंग कहते है। मल्टी प्रोसेसिंग सिस्टम का निर्माण मल्टी प्रोसेसर सिस्टम को ध्यान मे रखते हुए किया गया है अतः एक से अधिक प्रोसेसर उपल्ब्ध होने के कारण इनपुट आउटपुट एवं प्रोसेसींगतीनो कार्यो के मध्य समन्वय रहता है। एक ही तरह के एक से अधिक सी.पी. यू का उपयोग करने वाले सिस्टम को सिमिट्रिक मल्टी प्रोसेसर सिस्टम कहा जाता है। 
  • मल्टी टास्किंग: मेमोरी मे रखे एक से अधिक प्रक्रियाओ मे परस्पर नियंत्रण मल्टी टास्किंग कहलाता है. किसी प्रोग्राम से नियत्रण हटाने से पहले उसकी पूर्व दशा सुरक्षित कर ली जाती है जब नियंत्रण इस प्रोग्राम पर आता है प्रोग्राम अपनी पूर्व अवस्था मे रहता है। मल्टी टास्किंग मे यूजर को ऐसा प्रतित होता है कि सभी कार्य एक साथ चल रहे है।  
  • मल्टी थ्रेडिंग: यह मल्टी टास्किंग का विस्तारित रूप है एक प्रोग्राम एक से अधिक थ्रेड एक ही समय मे चलाता है। उदाहरण के लिए एक स्प्रेडशिट लम्बी गरणा उस समय कर लेता है जिस समय यूजर आंकडे डालता है.
  • रियल टाइम: रियल टाइम आपरेटिंग सिस्टम की प्रक्रिया बहुत ही तीव्र गति से होती है रियल टाइम आपरेटिंग सिस्टम का उपयोग तब किया जाता है जब कम्पयुटर के द्वारा किसी कारेय विशेष का नियंत्रण किया जा रहा होता है। इस प्रकार के प्रयोग का परिणाम तुरंत प्राप्त होता है । और इस परिणाम को अपनी गरणा मे तुरंत प्रयोग मे लाया जाता है। आवशअयकता पडने पर नियंत्रित्र की जाने वाली प्रक्रिया को बदला जा सकता है। इस तकनीक के द्वारा कम्पयुटर का कार्य लगातार आंकडे ग्रहण करना उनकी गरणा करना मेमोरी मे उन्हे व्यवस्थित करना तथा गरणा के परिणाम के आधार पर निर्देश देना है.
उपयोगकर्ता की गिनती के आधार पर ऑपरेटिंग सिस्टम को दो भागो मे विभाजित किया गया है
  • एकल उपयोगकर्ता: एकल उपयोगकर्ता आपरेटिंग सिस्टम वह आपरेटिंग सिस्टम है जिसमे एक समय मे केवल एक उपयोगकर्ता काम कर सकता है। 
  • बहुल उपयोगकर्ता: वह आपरेटिंग सिस्टम जिसमे एक से अधिक उपयोगकर्ता एक ही समय मे काम कर सकते कर सकते है.
काम करने के मोड के आधार पर भी इसे दो भागो मे विभाजित किया गया है
  • कैरेक्टर यूजर इंटरफेस: यहा पर उपयोगकर्ता सिस्टम को कैरेक्टर की श्रृंखला के रूप मे कमाण्ड देता है। जब उपयोगकर्ता सिस्टम के साथ कैरेक्टर के द्वारा सूचना देता है तो इस आपरेटिंग सिस्टम को कैरेक्टर यूजर इंटरफेस कहते है उदाहरण डॉस.
  • ग्राफिकल यूजर इंटरफेस: जब उपयोग कर्ता कम्पयुटर से चित्रो के द्वारा सूचना का आदान प्रदान करता है तो इसे ग्राफिकल यूजर इंटरफेस (GUI) कहा जाता है। उदाहरण विन्डो.
अधिकांश सी.पी.यू. दो मोड पर कार्य करते है: युजर मोड तथा कर्नल मोड. कर्नल मोड सभी निर्देशो के प्रचालन की सुविधा प्रदान करता है। सुरक्षा की दृष्टी से युजर मोड कुछ निर्देशोके प्रचालन की सुविधा प्रदान करता है। सामान्यतया प्रोग्राम यूजर मोड मे ही प्रचालित होते है । आपरेटिंग सिस्टम कर्नल मोड पर प्रचालित होते है। प्रोसेसर शिड्युलिंग, मेमोरी मैनेजमेंट,  फाइल मैनेजमेंट तथा इनपुट /आउटपुट मैनेजमेंट के आधार पर ऑपरेटिंग सिस्टम को निम्नलिखित वर्गों मेंवर्गीकृत किया जा सकता है:
  • बैच ऑपरेटिंग सिस्टम: कम्प्यूटर के शुरूआती दिनों में कम्प्यूटर सिस्टम में इनपु डिवाइस के रूप में कार्ड-रीडर्स तथा टेप ड्राइव्स एवम् आउटपुट डिवाइस के प्रयोग हुआ करते थे। उस समय यूजर कम्प्यूटर सीधे-सीधे इन्ट्रैक्ट न कर, एक जॉब तैयार किया करते थे,जो प्रोग्राम डेटा ऑर कंट्रोल इन्फॉमेशन का बना हुआ होता था। यूजर अपने जॉब को तैयार करने के पश्चात् कम्पयूटर औपरेटर को सौंप देता था। इसी प्रकार दूसरा, तीसरा या अन्य यूजर अपने अपने जॉब तैयार कर कम्पयूटर ऑपरेटर को सौंप देते थे। जॉब्स, पंच कार्ड्स पर तैयार किए जाते थे। कम्पयूटर ऑपरेटर सभी जौब्स क एक साथ लोड कर उन्हें प्रोसेस करता था। कुछ मिनटों, घंटो या दिनों के पश्चात् जॉब्स प्रोसेस होकर आउटपुट देते थे। आउटपुट में प्रोग्राम के परिणाम के साथ साथ मेमोरी की अंतिम स्तिथि की डम्प तथा रजिस्टर के कनटेन्ट्स भी होते थे, जो प्रोग्राम की डिबगिंग में सहायक होते थे। प्रोसेसिंग स्पीड को बढाने के लिए कम्पयूटर ऑपरेटर समान प्राथमिकता वाले जॉब्स को एक साथसमुहित करके, उन्हें समूह में कम्पयूटर द्वारा रन करेहैं। बैच प्रोसेसिंग में सीपीयू के आइडल टाइम को कम करने के लिए रेसिडेंट मॉनिटर नामक एक प्रोग्राम क्रिएट किया गया,जो हमेशा रेसिडेंट मेमोरी में निवास करता था। रेसिडेंट मॉनिटर प्रोग्रामर द्वारा कन्ट्रोल कार्ड्स के माध्यम से दिए गए कमान्ड के अनुसार कार्य करता था। बैच प्रोसेसिंग इन्वारमेंट में अक्सर आइडल रहता था, क्योंकि इनपुट/आउटपुट डिवाइसेस की गति की गति की तुलना में काफी धीमी होती है। कम्पयूटर सिस्टम के रिसोर्सेस का अधिकतम उपयोग करने के लिए इनपुट/आउटपुट और प्रोसेसिंग ऑपरेशन को एक दुसरे से ओवरलैप करने के लिए चैनल्स पेरिफेरल कंट्रोलर्स तथा समर्पित इनपुट/आउटपुट प्रोसेसर्स का विकास हुआ। इसी दिशा में का भी विकास हुआ जो बिना के हस्तक्षेप के सीधे सीधे अपने बफर से डेटा के पूरे ब्लॉक को मेन मैमोरी में स्थानान्तरित कर सकता था। जब एक्जक्यूट कर रहा होता है, तो इनपुट/आउटपुट डिवाइसेस और मेन मैमोरी के बीच डेटा स्थानान्तिरित कर सकता है। कम्पयूटर सिस्टम के परफॉमेन्स को बढाने के लिए, के अलावा बफरिंग और स्पूलिंग नामक दो अन्य एप्रोच भी विकसित किए गए। बफरिंग में डेटा को इनपुट डिवाइस से रीड करने के पश्चात् इसे प्रोसेस करता है तथा प्रोसेसिंग के शुरू होने से ठीक पहले इनपुट डिवाइस अगले इनपुट की रीड करने के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा निर्देशित किया जाता है। इस प्रकार और इनपुट डिवाइस दोनों ही व्यस्त रहते हैं। प्रोसेस्ड डेटा को तब बफर में स्टोर करके रखता है, जब तक कि ये डेटा आउटपुट डिवाइस द्वारा स्वीकार नहीं करलिए जाते है। स्पूलिंग़, साइमलटैनिस पेरिफेरल ऑपरेशन ऑन लाइन का संक्षिप्त रूप है, स्पूलिंग भी एक मैथड है जिसके द्वारा सीपीयू एक से अधिक जॉब के इनपुट, प्रोसेसिंग और आउटपुट के बीच ओवरलैप करता है। स्पूलिंग की प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम, स्पूलर का प्रयोग करता है। 
  • मल्टीप्रोग्राम्ड ऑपरेटिंग सिस्टम: मल्टीप्रोग्राम्ड ऑपरेटिंग सिस्टम में मल्टीप्रोग्रामिंग टेकनीक निम्न तरीके से कार्य करती है:
    • मल्टीप्रोग्राम्ड ऑपरेटिंग सिस्टम एक से अधिक जॉब्स को मेमोरी में एक लोड करता है। 
    • ऑपरेटिंग सिस्टम इसमें से एक को एक्जक्यूट करना शुरू करता है। 
    • जब कोइ जॉब एक्जक्यूट कर रहा होता है, तो ऑपरेटिंग सिस्टम उन सभी का एक क्यू मेनटेन करता है, जो सीपीयू की उपलब्घता के लिए प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।
    • जब वर्तमान में एक्जक्यूट हो रहे जॉब में इनपुट-आउटपुट ऑपरेटिंग की आवश्यकता होती है, तो ऑपरेटिंग सिस्टम अगले जॉब की प्रोसेसिंग के लिए सीपीयू को उस जॉब पर स्थानान्तरित कर देते हैं।
    • जॉब पहले वाले जॉब के इनपुट-आउटपुट आपरेश्न समाप्त होता है, टो ऑपरेटिंग सिस्टम पुनः इसे क्यू में रख देता है ताकि जब सीपीयू उपलब्घ हो तो इसकी बाकी प्रोसेसिंब पुरी की जा सके।
    • इस प्रकार ऑपरेटिंग सिस्टम सीपीयू के कंट्रोल को एक जॉब से दुसरे जॉबपर स्थानान्तरित करता रहता है। परिणामस्वरूप सीपीयू कभी भी आइडल स्थिति में नहीं रहता है।
  • टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम: टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम प्रत्येक यूजर के लिए एक क्रम में सीपीयू समय की एक समान मात्रा एलोकेट करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा प्रत्येक यूजर को सीपीयू द्वारा दिया जाने वाला समय टाइम-स्लाइस कहलाता है। यह टाइम- स्लाइस, 5 से 100 मिलीसेकण्ड्स तक का होता है।टाइम-शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम में उचित रिस्पॉन्स टाइम को प्राप्त करने के लिए जॉब्स को मेन मैमोरी से डिस्क में और डिस्क से मेन मैमोरी में स्वैप करने की आवश्यकता होती है। वर्चुअल मेमोरी इसी प्रकार का एक टेकनीक है, जो वैसे जॉब्स को प्रोसेस करने के लिए प्रयुक्त होता है, जो मेन मेमोरी में पूर्णरूपेण नहीं होते हैं. अतः वर्चुअल मेमोरी मेथड द्वारा वैसे जॉब्स को प्रसेस किया जाता है, जिनका साइज फिजिकल मेमोरी से बड़ा होता है।
बूटिंग: कम्प्यूटर के ऑन होने पर मॉनीटर स्क्रीन पर डॉस प्रॉम्ट प्रदर्शित होने तक की क्रिया को बूटिंग कहा जाता है । ऑपरेटिंग सिस्टम विन्डोज 95 अथवा इसके बाद के संस्करणों में विन्डोज के खुलने तक की क्रिया को बूटिंग कहा जाता है । बूटिंग दो प्रकार की होती है
  • कोल्ड बूटिंग: जब कम्प्यूटर को उसके पावर स्विच को ऑफ करने के बाद पुनः ऑन करके बूट किया जाता है, तो इस प्रकार की बूटिंग को कोल्ड बूटिंग कहा जाता है। 
  • वार्म बूटिंग: जब कम्प्यूटर को उसकी प्रोसेसिंग यूनिट के सामने वाले भाग पर दिए गए रीसेट बटन दबाकर अथवा ‘की-बोर्ड’ पर Ctrl, Alt और Del तीनों ‘कीज’ को एक साथ दबाकर बूट किया जाता है, तो इस प्रकार की बूटिंग को वॉर्म बूटिंग कहा जाता है। कम्प्यूटर को बूट करने के लिए एम एस-डॉस की तीन फाइल्स-MS_DOS.SYS, IO.SYS एवं COMMAND.COM होनी आवश्यक है। इनमें से पहली दो फाइल्स हिडन यानी छुपी हुई फाइल्स होती हैं एवं COMMAND.COM एक सामान्य फाइल होती है । ये फाइल्स, यदि डॉस कम्प्यूटर की हार्डडिस्क में स्थापित है, तो हार्डडिस्क में और यदि नहीं है, तो िजस फ्लॉपी से कम्प्यूटर को चालू (बूट) किया जा रहा है, अर्थात् बूटेबल फ्लापी डिस्क में होनी चाहिए।
ऑपरेटिंग सिस्टम सीधे - सीधे कम्प्यूटर हार्डवेयर रिसोर्सेस को नियंत्रित करता है तथा अन्य प्रोग्राम्स आपरेटिंग सिस्टम के माध्यम से कम्प्यूटर सिस्टम के रिसोर्सेस को एक्सेस करते हैं। यूजर दो तरीकों से आपरेटिंग सिस्टम से इन्ट्रैक्ट कर सकता है-
  • सिस्टम कॉल के द्वारा: सिस्टम कॉल प्रोसेस तथा आपरेटिंग सिस्टम के बीच इन्टरफेस प्रदान कर सकते हैं। ज्ञातव्य हो कि जब कोई प्रोग्राम रन कर रहा होता है. तो उसे प्रोसेस कहते हैं। पहले सिस्टम कॉल्स को एसेम्बली लैंग्वेज में लिखा जाता था, परन्तु आजकल ये हाई-लेवल-लैंग्वेजस जैसे- C,C++,Pascal इत्यादि में भी लिखे जा सकते हैं। सिस्टम कॉल को पाँच श्रोणियों में समूहित किया जा सकता है
    • प्रोसेस कंट्रोल: किसी भी प्रोग्राम के रनिंग स्टेटस को प्रोसेस कहा जाता है। किसी भी रनिंग प्रोग्राम के एक्जक्यूशन को या तो साधारणतया उसके एक्जक्यूशन के समाप्ति पर या एक्जक्यूशन के बीच से ही अर्थात् एबोर्ट करके हाल्ट किया जा सकता है। यदि कोई सिस्टम कॉल किसी रन कर रहे प्रोग्राम अर्थात् प्रोसेस को बीच में ही एबोर्ट कर, उसके एक्जक्यूशन को टरमिनेट करता है, तो आपरेटिंग सिस्टम, मेमोरी के डम्प को लेकर डिस्क में लिख देता है तथा एक एरर मैसेज जनरेट करते है। डिस्क में लिखा गया मेमोरी डम्प, डिबगर द्वारा समस्या के कारण को सुनिश्चित करने के लिए निरीक्षित किया जाता है। प्रोसेस के नार्मल या एबनार्मल दोनों ही टरमिनेशन की परिस्थितियों में आपरेटिंग सिस्टम कमाण्ड इन्टरप्रेटर को कन्ट्रोल ट्रान्सफर करता है। इसके बाद कमाण्ड इन्टरप्रेटर अगले कमाण्ड को रीड करते है। इन्टरैक्टिव सिस्टम में कमाण्ड इन्टरप्रेटर अगले कमाण्ड को रीड कर एक्जक्यूट करते है,जबकि बैच सिस्टम में कमाण्ड इन्टरप्रेटर पूरे जॉब को टरमिनेट कर अगले जॉब को रीड कर एक्जक्यूट करता है।
    • फाइल प्रबंधन: इस श्रोणी के अन्तर्गत वैसे सिस्टम काँल आते हैं, जो फाइल को किएट, डिलीट, काँपी तथा फाइल के को देखने तथा सेट करने के लिए प्रयोग किये जाते हैं । किसी भी फाइल को क्रिएट करने के लिए जहाँ सिस्टम काल में फाइल के नाम को निर्दिष्ट करने की आवश्यकता होती है, वही पाइल को डिलीट करने के लिए फाइल के नाम के साथ-साथ उनके एट्रीब्यूट्स को भी चेक करने जरूत पड़ती हैकिसी भी पाइल को क्रिएट करने के पश्चात् उसे ओपन कर,रीड या राइट या रिवाइन्ड किया जा सकता है। अन्त में फाइल को बन्द करने की आवश्यकता होती है। ये सभी प्रक्रियाए सिस्टम काँल के द्वारा पूरी की जा सकती हैं। ज्ञातव्य हो कि पाइल एट्रीब्यूट्स के अन्तर्गत फाइल का नाम, फाइल का टाइप, प्रोटेक्शन कोड़ इत्यादि आते हैं।
    • डिवाइस प्रबंधन
    • सूचना प्रबंधन
    • कम्यूनिकेशन्स
  • ऑपरेटिंग सिस्टम कमाण्ड्स के द्वारा: यूजर,सिस्टम काल्स के अलावा आपरेटिंग सिस्टम से आपरेटिगं सिस्टम के कमाण्ड्स के द्वारा भि इन्ट्रैक्ट कर सकता है। उदाहरणस्वरूप यदि आप MS DOS में किसी डाइरेक्ट्री के फाइलों या सब डाइरैक्ट्रीज को देखना चाहते है,तो आप DIR कमाण्ड का आह्वान कर सकते हैं। आपरेटिंग सिस्टम अपने कमण्ड्स के द्वारा यूजर और कम्प्यूर सिस्टम के हार्डवेयर के बीच कॉम्यूनिकेट करता हैं। ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रमुख उद्देश्य यूजर की समस्या का समधान करना है, अतः ज्यादातर आपरेटिगं सिस्टम के साथ सर्वसाधारण समस्या को हल करने के प्रोग्राम्स की अपूर्ति की जाती है। इन प्रोग्राम्स के अन्तर्गत वेब ब्राउजर्स, टेक्स्ट र्फार्मेटस, वर्ड-प्रोसेसर्स, कम्पाइलर्स, डेटाबेस सिस्टम स्प्रेडशीट्स इत्यादी आते हैं। ये प्रोग्राम सिस्टम यूटिलिटीज या एप्लीकेशन प्रोग्राम्स के नाम से जाने जाते हैं। कमाण्ड इन्टंरप्रेटर किसी भी आपरेटिंग सिस्टम का सबसे महत्वपूर्ण प्रोग्राम होता है। कमाण्ड इन्टरप्रेटर का प्रमूख कार्य द्वारा दिए गए कमाण्ड को स्वीकार कर एक्जक्यूट ना होता हैं। कुछ आपरेटींग सिस्टम के कमाण्ड इन्टरप्रेटर कमाण्ड्स को एक्जक्यूट करने का कोड अपने आप मे साधरण करता है, जबकि कुछ ऑपरेटिंग सिस्टम मे कमाण्ड इन्टरप्रेटर दिए गए कमाण्ड कोफाईल सिस्टम मे खोज कर मेमोरी में लोड कर, कमाण्ड के साथ दिए गए पैरामिटर के साथ एक्जक्यूट करता है। उदहारणस्वरुप MS-DOS का कमाण्ड इन्टरप्रेटर, जो command.com है, अनेको कमाण्डस को एक्जक्यूट करने का कोड धारण करता है। जैसे यूजर द्वारा किसी फाइंल को डिलीट करन के लिए दिया गया DEL कमाण्ड, कमाण्ड इन्टरप्रेटर (command.com) द्वारा स्विकार कर एक्जक्युट भी किया जाता है। जबकि UNIX में यदि abc नामक फाइल को डिलीट करने के लिए कमाण्ड्स यूजर द्वारा दिया जाता है, तो का कमाण्ड इन्टरप्रेटर, नामक फाइल को फाइल सिस्टम से खोज कर,इसे मिमोरी मे लोड कर, abc पैरामिटर के साथ एक्जक्यूट करता है। अतः इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि UNIX में किसी कमाण्ड की क्रियात्मकता अलग-अलग फाइल में परिभाषित की जाती, ना कि कमाण्ड इन्टरप्रेर में।
चूँकि ऑपरेटिंग सिस्टम एक बड़ा और जटिल सॉफ्टवेयर है, जो बड़ी संख्या में फंक्शन्स का समर्थन करता है। अतः ऑपरेटिंग सिस्टम का विकास एक मोनोलिथिक सॉफ्टवेयर के रूप में न होकर कई छोटे-छोटे मॉड्यूल्स के कलेक्शन के रूप में होना चाहिए। इनमें से प्रत्येक मॉड्यूल के इनपुट्स, आउटपुट्स तथा कार्य अच्छी तरह से परिभाषित होने चाहिए।
  • लेयर्ड स्ट्रक्चर एप्रोच: लेयर्ड स्ट्रक्चर एप्रोच, ऑपरेटिंग सिस्टम को विभिन्न सतहों में विभाजित कर, उसे डेवलप करने की एक विधि है। प्रत्येक सतह नीचे वाली सतह के शीर्ष पर बनाई जाती है। सबसे नीचे की सतह हार्डवेयर की होती है। जबकि सबसे ऊपर की सतह यूज़र इंटरफेस की होती है। लेयर्ड स्ट्रक्चर एप्रोच के तहत THE नामक ऑपरेटिंग सिस्टम, एक बैच ऑपरेटिंग सिस्टम था, जिसमें छः सतहें थीं। 
  • कर्नल एप्रोच: कर्नल एप्रोच में ऑपरेटिंग सिस्टम दो अलग-अलग भागों का बना होता है। पहले भाग को कर्नल कहा जाता है और दूसरे भाग में सिस्टम प्रोग्राम्स होते हैं। कर्नल, सिस्टम प्रोग्राम्स और हार्डवेयर के मध्य अवस्थित होता है। कर्नल हार्डवेयर सिस्टम से इंटरफेस स्थापित करता है। 
  • वर्चुअल मशीन: वर्चुअल मशीन एक कॉनसेप्ट है, जो वास्तविक मशीन की जगह अनेक वास्तविक मशीनों के होने का भ्रम उत्पन्न करता है। वर्चुअल मशीन तकनीक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्रत्येक यूज़र अपनी इच्छा के अनुसार ऑपरेटिंग सिस्टम को रन कर सकता है।
ऑपरेटिंग सिस्टम के कार्य: ऑपरेटिंग सिस्टम के निम्नलिखित कार्य हैं
  • प्रोसेस मैनेजमैंट: जब भी कोइ प्रोग्राम मैनेजमेंट एक्जक्यूट कर रहा होता है,तो उस प्रोग्राम को प्रोसेस कहा जाता है।किसी क्रार्य को पूरा करने के लिए किसी भी प्रोग्रेस के लिए किसी भी प्रोग्रेस को निश्चित रिसोर्सेस की आवश्यकता होती है। रिसोर्सेस की आवश्यकता होती है। रिसेर्सेस के अन्तर्गत सी.पी.यू का टाइम,मेमोरी ,फाइल्स और इनपुट या आउटपुट डिवाइसेस आते हैं।ये रिसोर्सेस किसी भ प्रोसेस को ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा तब एलोकेट किए जाते हैं,जब प्रोग्रेस रन कर रहा होता है। प्रोग्रेस दो प्रकार के होते हैं--ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रोसेसेस और यूजर सिस्टम के प्रोसेसेस। ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रोसेसेस सिस्टम कोड को एक्जक्यूट करते हैं,जबकि यूजर के प्रोसेसेस यूजर के कोड को एक्जक्यूट करते हैं।ये सभी प्रोसेसेस CPU को द्वारा विभाजित कर एक साथ एक्जक्यूट करता हैं। प्रोसेस मैनेजमें के संर्दभ में ऑपरेटिंग सिस्टम निम्नलिखित कार्यों के लिए उत्तरदायी होता है- यूजर और सिस्टम प्रोसेसेस क्रिएट तथा डिलीट करना प्रोसेसेस को ससपेन्ड और रिज्यूम करना प्रोसेस कॉम्यूनिकेशन के लिए मेकेनिज्म प्रदान करना। प्रोसेस सिनक्रोनाइजेशन के लिए मेकेमिज्म प्रदान करना डेडलॉक हैन्डलिंग के लिए मेकेनिज्म प्रदान करना। 
  • मेन-मोमेरी मैनेजमेंट: किसी भी आधुनिक कम्पयूटर सिस्टम में किसी भी ऑपरेशन को स्मपादित करने मेंन-मेमोरी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है;क्योंकि मेन मेमोरी ही वह जगह है,जहा से CPU और I/Q डिवाइसेस डेटा को तेजी से एक्सेस कर सकते हैं। मेन-मेमोरी के वर्ड्स या बाइट्स का बहुत बड़ा एरे कहा जा सकता है,जिसमे प्रत्येक वर्ड या बाइट का अपना एड्रेस होता है।इन्सद्रकशन -फेच साइकल के समय CPU मेन-मेमोरी से ही इन्सट्रक्शन्स को रीड करता है।तथा डेटा -फेच साइकल के समय CPU ,मेन-मेमोरि से डेटा रीड/राइड करता है।यहां तक कि DMA के माध्यम से किए जाने वाले I/Q ऑपरेशन्स भी मेन-मेमोरी रीड -राइट ऑपरेशन कहत हैं। अतः हम यह कह सकते है कि मेन-मेमोरी एक बहुत बड़ा स्टोरेज डिवाइस है,जिसको CPU एड्रेस कर सकता है तथा सीधे-सीधे एक्सेस कर सकता है। उदाहरणस्वरूप यदी डिस्क में स्टेर्ड डेटा प्रोसेस करना है तो सर्वप्रथम डेटा को डिस्क से मेन-मेमोरी में स्थानान्तरित करना होगा । इस स्थानान्तरित कोप्रोसेस करने के लिए इन्सट्रक्शन्सनिश्चित रूप से मेमोरी में विधमान होना चाहिए,जो (CPU) द्वारा एक्जक्यूट किए जा सकें । किसी भी प्रोग्राम को एक्जक्यू करने के लिए प्रोग्राम को मेमोरी में लोड किया जाता है,परन्तु इससे पूर्व प्रोग्राम को एबसॉल्यूट एड्रेस से मैप किया जाना आवश्यक हता है। जब प्रोग्रोम एक्जक्यूट करता है, तो उस प्रोग्राम इन्सट्रक्शन्स और डेटा को मेन-मेमोरी से एक्सेस करता है अन्त मे जब प्रोग्राम टरमिनेट होता है, तो मेन-मेमोरी का स्पेस खाली हो जाता है,जो अगले प्रोग्राम के लिए उपलब्ध होता है। अतः उसमें अगले प्रोग्राम को लोड कर एक्जकयूट किया जा सकता है। ज्ञातव्य हो CPU का अधिकतम उपयोग करने के लिए मेमोरी में एक साथ एक से अधिक प्रोग्राम्स को स्टोर किया जाता है। इसके लिए विभिन्न मैनेजमेंट टेकनीक का प्रयोग किया जाता । इन मेमोरी मैनेजमेंट टेकनीक में किसी भी टेकनीक का चुनाव कम्पयुटर सिस्टम के हार्डवेयर डिजाइन को ध्यान मे रखकर करना पड़ता है। मेमोरी मैनेजमेंट के सदंर्भ में ऑपरेटिंग सिस्टम निम्नलिखित कार्यों के लिए उत्तरदायी है
    • वर्तमान में मेमोरी का कौन सा हिस्सा किस प्रोसेस द्वारा उपयोग हो रहा है.
    • मेमोरी स्पेस उपल्ब्ध होने पर यह निर्णय लेना कि मेमोरी में किन प्रोसेस को लोड किया जाएगा.
    • आवश्यकतानुसार मेमोरी स्पेस को एलोकेट और डिएलोकेट करना। 
  • फाइल मैनेजमेंट: फाइस मैनेजमेंट ऑपरेटिंग सिस्टम का सबसे दृश्य कम्पोनेन्ट है। फाइल,बाइट्स की एक माला होती है। दूसरे शब्दो मे कह सकते हैं कि,फाइल, सम्बन्धित इन्फरमेशन का एक कॉलेक्शन है,जो इसके बनाने वाले द्वारा परिभाषित किया जाता है। प्रत्येक फाइल जो सेकेण्डरी स्टोरेज डिवाइस में स्टोर की जाती है, उसका कुछ नाम होता है, जिस नाम से उसे निर्दिष्ट किया जाता है।प्रत्येक फाइल सेकण्डरी स्टोरेज डिवाइस में किसी डाइरेक्ट्री के अधीन स्टोर की जाती है।प्रत्येक फाइल की अपनी प्रॉपर्टीज अर्थात एर्टीब्यूट्स होती है। फाइल मैनेजमेंटके सन्दर्भ में ऑपरेटिंग सिस्टम निम्नलिखित कार्यों के लिए उत्तरदायी है
    • फाइलों को क्रिएट तथा डिलीट करना।
    • डाइरेक्ट्रीज को क्रिएट तथा डिलीट करना।
    • फाइल्स तथा डाइरेक्ट्रीज के मैनिपुलेशन को समर्थन करना।
    • फाइलों को सेकेण्डरी स्टोरेज पर मैप करना।
    • फाइलों के बैकअप का समर्थन करना।
  • सेकेन्डरी स्टोरेज मैनेजमेंट: चूकीं मेन -मेमोरी का साइज इतना बड़ा है वह सभी डेटा और प्रोग्राम को स्टोर कर सके ,साथ ही इसकी प्रकृति उध्र्वनशील होती है। ज्ञातव्य हो की उध्र्वनशील मेमोरी वह मेमोरी होती है, जिसमें स्टोर किए गए डेटा और प्रोग्राम पावर के गायब होने की स्थिती में नष्ट हो जाते हैं। अतः कम्प्यूटर सिस्टम में मेन-मोमेरी स्टोर्ड डेटा और प्रोग्राम को स्थायी रूप से स्टोर कर ने के लिए सेकेण्डरी स्टोरेज का होना आवश्यक होता है। आजकल कम्प्यूटर सिस्टम में डिस्क का उपयोग डेटा और प्रोग्राम को स्टोर कर ने के लिए ऑन-लाइन स्टोरेज मीडिया के रूप मे किया जाता है।डिस्क मैनेजमेंट के संर्दभ में ऑपरेटिंग सिस्टम निम्नलिखित कार्यों के लिए उत्तरदायी हैं
    • डिस्क के फ्री-स्पेस को मैनेज करने के लिए।
    • स्टोरेज स्पेस को एलोकेट करने के लिए।
    • डिस्क शिड्युलिंग के लिए।
मेमोरी मैनेजमेंट: सीपीयू(CPU) को एक से अधिक प्रोसेसेस के बीच शेयर कर इसके उपयोग और परफॉर्मेंस को बढ़या जा सकता है। सीपीयू(CPU) के उपयोग और परफॉर्मेंस को बढ़ाने के लिए, सभी प्रोसेसेस को एक साथ प्राइमरी मैमोरी में रखा जाता है। अतः सीपीयू(CPU) के परफॉर्मेंस को बढ़ाने के लिए मैनोरी की शेयरिंग आवश्यक होती है। मेन मैमोरी का ऑर्गेनाइजेशन ऐर मैनेजनेंट ऑपरेटिंग सिस्टम की डिजाइनिंग को प्रभावित करने वाला सबसे प्रमुख कारक रहा है। प्राथमिक रूप से मैमोरी मैनेजमेंट का संबंध रिक्वेस्टिंग प्रोसेस के लिए मेन मैमोरी को एलोकेट करना है, क्योंकि कोई भी प्रोसेस तब तक रन नहीं कर सकता है, जब तक उसके लिए मैमोरी को एलोकेट नहीं किया जाता है।

मैमोरी मैनेजमेंट की स्कीम्स
  • सिंगल प्रोसेस मॉनिटरिंग: सिंगल प्रोसेस मॉनिटर सबसे सरल मैमोरी मैनेजमेंट एप्रोच है। इस एप्रोच में, मैमोरी को दो भागों में विभाजित किया जाता है, जिसमें पहला भाग ऑपरेटिंग सिस्टम प्रोग्राम के लिए होता है, जिसे मॉनिटर भी कहा जाता है। जबकि दूसरा भाग यूज़र प्रोग्राम के लिए होता है। इस प्रकार के एप्रोच में, ऑपरेटिंग सिस्टम, मैमोरी के पहले और अंतिम लोकेशन का आंकड़ा यूज़र प्रोग्राम के लोकेशन के लिए रखता है। यूज़र प्रोग्राम के लिए कन्टिग्युअस एरिया(area) प्रदन करने के लिए, ऑपरेटिंग सिस्टम मैमोरी के शीर्ष (Top) या गर्त (Bottom) में लोड किया जाता है। चूँकि इन्ट्रप्ट वेक्टर, लो मैमोरी में रहता है। अतः ऑपरेटिंग सिस्टम प्रोग्राम, जिसे मॉनिटर भी कहा जाता है, को लो मैमोरी में ही रखा जाता है।
  • मल्टीप्रोग्रामिंग: मल्टीप्रोग्रामिंग इनवायरमेंट में एक से अधिक प्रोग्राम एक साथ प्राथमिक मैमोरी में रखे जाते हैं तथा सीपीयू तेजी से एक प्रोग्राम से दूसरे प्रोग्राम के बीच कंट्रोल को पास करता है। मल्टीप्रोग्रामिंग में पूरे मेन मैमोरी को कई भागों में बाँट दिया जाता है तथा प्रत्येक भाग, एक-एक प्रोसेस एलोकेट कर दिया जाता है।  
मैमोरी पार्टिशनिंग दो प्रकार की हो सकती है
  • स्टैटिक पार्टिशनिंग: स्टैटिक पार्टिशनिंग में सिस्टम जनरेशन प्रोसेस के समय ही अर्थात् प्रारम्भ में ही, मैमोरी को विभिन्न साइज के पार्टिशन्स में बाँट दिया जाता है तथा इन पार्टिशन्स के साइज में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।
  • डायनेमिक पार्टिशनिंग: डायनेमिक पार्टिशनिंग में मैमोरी को विभिन्न पार्टिशन्स में, रन टाइम में बाँटा जाता है, साथ ही इन पार्टिशन्स के साइज़ का निर्धारण भी ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा किया जाता है।
रिलोकेशन: रिलोकेशन का तात्पर्य किसी भी प्रोग्राम को वांछित मैमोरी पार्टिशन में लोड कर एक्ज़िक्यूट करने से है। प्राथमिक मैमोरी के वरिचुअल एड्रेस का वास्तविक एड्रेस या फिज़िकल एड्रेस में ट्रान्सलेट कब और कैसे होता है, के आधार पर, प्रोसेस या प्रोग्राम रिलोकेशन दो प्रकार के हो सकते हैं-स्टैटिक रिलोकेशन और डायनेमिक रिलोकेशन। यदि रिलोकेटिंग लिंकर या रिलोकेटिंग लोडर द्वारा किसी प्रोग्राम को मैमोरी में लोड करते समय या पहले रिलोकेट किया जाता है, तो रिलोकेशन के इस एप्रोच को स्टैटिक रिलोकेशन कहते हैं।

डायनेमिक रिलोकेशन: डायनेमिक रिलोकेशन में जब किसी प्रोसेस को शिड्यूल किया जाता है, तो बेस रजिस्टर को स्टार्टिंग एड्रेस के साथ लोड किया जाता है। प्रत्येक मैमोरी एड्रेस जो स्वतः जेनरेट होते हैं) को मेन मैमोरी में भेजने से पहले, बेस रजिस्टर के कन्टेन्ट्स से जोड़ दिया जाता है।

डायनेमिक पार्टिशनिंग: फिक्स्ड साइज पार्टिशनिंग में सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें पार्टिशन की साइज के छोटे होने की स्थिति में मैमोरी का वेस्टेज होता है। इस समस्या को दूर करने के लिए डायनेमिक पार्टिशनिंग नामक मैमोरी मैनेजमेंट एप्रोज का प्रयोग किया जाता है। डायनेमिक पार्टिशनिंग(या वैरिएबल पार्टिशनिंग) में प्रत्येक रिक्वेस्टिंग प्रोसेस की जरूरतों के अनुसार डायनेमिक ढ़ग से पार्टिशन्स क्रियेट किये जाते हैं। जब कोई प्रोसेस टर्मिनेट या स्वैप-आउट होता है, तो मैमोरी मैनेजर उस पार्टिशन के खाली स्पेस को फ्री-मैमोरी एरिया को लौटा सकता है, जिसमें पार्टिशन्स का एलोकेशन किया जाता है। डायनेमिक पार्टिशनिंग में न तो डायनेमिकली एलोकेटेड पार्टिशन की साइज और न ही पार्टिशन की संख्या की कोई सीमा होती है। क्योंकि मैमोरी मैनेजर, रिक्वैस्टिंग प्रोसेस के लिए तब तक पार्टिशन को क्रियेट और एलोकेट करता रहता है, जब तक कि फिजिकल मैमोरी का पूरा स्पेस पूरी तरह नहीं भर जाता है।

पेजिंग: पेजिंग एक मैमोरी मैनेजमेंट तकनीक है, जिसके द्वारा किसी प्रोसेस के फिजिकल एड्रेस को फिजिकल मैमोरी में नॉन-कन्टिग्युअस ढ़ंग से स्टोर किया जाता है। अर्थात् पेजिंग के द्वारा किसी भी प्रोसेस के लिए मैमोरी के किसी भी संभावित फिजिकल एड्रेस को एलोकेट किया जा सकता है। पेजिंग में सर्वप्रथम फिजिकल मैमोरी को फिक्स्ड साइज के ब्लॉक्स में विभाजित कर दिया जाता है, जिन्हें फ्रेम्स कहते हैं। इसके बाद लॉजिकल मैमोरी को फिक्स्ड साइज के ब्लॉक्स में विभाजित कर दिया जाता है, जिन्हें पेजेस कहते हैं। जब किसी प्रोग्राम को रन करना होता है, तो इसके पेजेस डिस्क या किसी भी बैकिंग स्टोरेज से किसी मैमोरी फ्रेम में लोड हो जाते हैं। डिस्क या बैकिंग स्टोरेज को फिक्स्ड-साइज के ब्लॉक्स में विभाजित किया जाता है। इन ब्लॉक्स की साइज मैमोरी फ्रेम्स की साइज के बराबर होता है।

सेगमेन्टेशन: सेगमेन्टेशन एक मैमोरी मैनेजमेन्ट स्कीम है, जो मैमोरी को प्रोग्रामर के सोचने की दृष्टि का समर्थन करता है। कोई भी प्रोग्राम, ट्रान्सलेशन टाइम में लॉजिकली रिलेटेड इन्टिटीज़ को एक साथ ग्रुप कर सेगमेन्ट्स को बनाया जाता है। इन सेगमेन्ट्स का फॉर्मेशन कम्पाइलर के अनुसार वैरी करता है।

वर्चुअल मैमोरी: वर्चुअल मैमोरी एक ऐसी मैमोरी मैनेजमेंट तकनीक है, जो प्रोग्राम को टुकड़ों में विभाजित करने तथा इसे स्वैप-इन और स्वैप-आउट करने का कार्य करता है। वर्चुअल मैमोरी के द्वारा वैसे प्रोग्राम्स को भी मैमोरी में लोड या एक्जिक्यूट किया जा सकता है, जिनकी साइज फिजिकल मैमोरी से अधिक हो। वर्चुअल मैमोरी को छोड़ कर अन्य सभी मैमोरी मैनेजमेंट तकनीकों में सभी प्रोसेसेस को उनके एक्जिक्यूट होने से पहले मैमोरी में रहना या रखना आवश्यक होता है। परन्तु वर्चुअल मैमोरी द्वारा उन प्रोसेसेस को भी एक्जिक्यूट किया जा सकता है, जो पूर्णरूपेण मैमोरी में नहीं रखे गये हों। इस प्रकार वर्चुअल मैमोरी प्रोग्रामर के लिए फिजिकल मैमोरी के वास्तविक साइज से अधिक होने का भ्रम उत्पन्न करता है। वर्चुअल मैमोरी को पेज्ड या सेगमेन्टेड मैमोरी मैनेजमेंट तकनीक के विस्तार के रूप में भी कार्यान्वित किया जा सकता है, डिमाण्ड पेजिंग या डिमाण्ड सेगमेन्टेशन कहते हैं।

फ़ाइल मैनेजमेंट: फाइल, संबंधित सूचनाओं का एक समूह है। प्रत्येक फाइल का एक नाम होता है, जिसके द्वारा इन्हें निर्दिष्ट किया जाता है। फाइल मैनेजमेंट किसी भी ऑपरेटिंग सिस्टम एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो डाटा और प्रोग्राम को सेकेण्डरी स्टोरेज डिवाइस में स्टोर करने से लेकर उसे मैनेज करने तक का कार्य करता है। फाइल मैनेजमेंट सिस्टम निम्नलिखित कार्यों के लिए उत्तरदायी होता है
  • लॉजिकल फाइल एड्रेस से फिजिकल डिस्क एड्रेस की मैपिंग के लिए।
  • डिस्क स्पेस के मैनेजमेंट, एलोकेशन और डिएलोकेशन के लिए।
  • सिस्टम की सभी फाइलों की जानकारी रखने के लिए।
  • फाइलों की शेयरिंग और प्रोटेक्शन के लिए।
फाइल: कोई भी फाइल, बिट्स या बाइट्स या रिकॉर्ड्स के सिक्वेंस का कलेक्शन होता है। किसी फाइल में कोई आवेदन, रिपोर्ट, कोई एक्जिक्यूटेबल प्रोग्राम या फिर लाइब्रेरी फंक्शन्स को स्टोर किया जा सकता है।

डाईरेक्टरी: ज्यादातर ऑपरेटिंग सिस्टम में डायरेक्टरी को फाइल के रूप में व्यवस्थित किया जाता है। कोई भी डायरेक्टरी अपने से संबंधित फाइलों की जानकारी रखती है। कोई भी डायरेक्टरी एक फ्लैट डायरेक्टरी या फिर हैरारिकल डायरेक्टरी हो सकती है। फ्लैट डायरेक्टरीज़ वे डायरेक्टरीज़ हैं, जिनमें रूट डायरेक्टरी सभी सिस्टम फाइल्स को धारण करती है तथा जिनमें कोई भी सब-डायरेक्टरी नहीं होती है। हैरारिकल डायरेक्टरीज़, डायरेक्टरीज़ तथा सब-डायरेक्टरीज़ का एक समूह होती हैं। फाइल को ज्यादातर हैरारिकल डायरेक्टरी में ही ऑर्गेनाइज किया जाता है।

डिस्क ऑर्गेनाइजेशन: किसी डिस्क पर स्टोर की गई सूचनाओं को उस डिस्क के ड्राइव नम्बर, सतह तथा ट्रैक द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है। डिस्क प्लैटर का बना होता है। प्रत्येक प्लैटर की दो सतहें होती हैं। अतः यदि किसी डिस्क में 6 प्लैटर हैं, तो उसमें 12 सतहें होंगी। परन्तु रीड-राइट ऑपरेशन में केवल 10 सतहें ही काम आयेंगी, क्योंकि सबसे ऊपरी प्लैटर की ऊपरी सतह और सबसे नीचे वाले प्लैटर के नीचे वाली सतह पर रीड-राइट ऑपरेशन नहीं किया जा सकता है। सभी प्लैटर एक साथ उदग्र रूप से, सेलेण्डर का निर्माण करते हैं। डिस्क सतह, ट्रैक्स में बंटा होता है तथा ट्रैक्स सैक्टर में बंचे होते हैं। इनपॉर्मेशन को डिस्क पर किसी ट्रैक में ब्लॉक्स के रूप में स्टोर किया जाता है। ब्लॉक्स की साइज सैक्टर साइज के बराबर होनी चाहिए।

डिस्क स्पेस मैनेजमेंट: ऑपरेटिंग सिस्टम डिस्क के फ्री-स्पेसेस की एक लिस्ट मेनटेन करता है, जिससे वह डिस्क के अप्रयुक्त डिस्क-ब्लॉक्स की जानकारी रखता है। नयी फाइल को क्रियेट करने के लिए प्री डिस्क स्पेस की लिस्ट को सर्च किया जाता है तथा नयी फाइल को प्री डिस्क स्पेस एलोकेट किया जाता है। नयी फाइल को एलोकेट किये गये डिस्क स्पेस की साइज की मात्रा को फ्री डिस्क स्पेस की लिस्ट से हटा दिया जाता है। जब किसी फाइल तो डिलिट किया जाता है, तो उस फाइल द्वारा छेंके गये डिस्क स्पेस को फ्री डिस्क स्पेस की लिस्ट में जोड़ दिया जाता है।

बिट वेक्टर: ज्यादातर डिस्क के फ्र स्पेस को बिट वेक्टर या बिटमैप के रूप में कार्यान्वित किया जाता है। बिट वेक्टर मैथड में डिस्क के प्रत्येक ब्लॉक को एक बिट से दर्शाया जा सकता है.

डिस्क एलोकेशन मैथड
  • कन्टिग्युअस एलोकेशन
  • लिंक्ड एलोकेशन
  • इन्डेक्स्ड एलोकेशन
फाइल प्रोटेक्शन: मल्टीयूज़र इनवायरमेंट में फाइल की सुरक्षा आवश्यक होती है, इसमें फाइलों की शेयरिंग एक से अधिक यूज़रों के द्वारा की जाती है। फाइलों की सुरक्षा के लिए विभिन्न प्रोटेक्शन मैकेनिज्म उपयोग किये जाते हैं-
  • पासवर्ड
  • एक्सेस लिस्ट
  • एक्सेस ग्रुप
प्रोसेस मैनेजमेंट: ऑपरेटिंग सिस्टम प्रत्येक रिसोर्स की स्थिति की जानकारी रखता है और निश्चित पॉलिसी के आधार पर विभिन्न प्रोसेसेस के लिए रिसोर्सेस को बांटता है तथा यह निर्णय भी लेता है कोई प्रोसेस कितनी देर तक रिसोर्सेस का प्रयोग करेगा। अंत में यह बांटे गये रिसोर्सेस को डिएलोकेट भी करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा फिजिकल प्रोसेसरेस का प्रबंधन अर्थात् प्रोसेसेस या टास्क्स या जॉब्स के लिए प्रोसेसर को एलोकेट करना ही प्रोसेसर मैनेजमेंट कहलाता है।

प्रोसेस कॉनसेप्ट: प्रोग्राम की एक्जिक्यूट कर रही अवस्था ही प्रोसेस है। प्रोग्राम जहाँ पैसिव इन्टिटी है, जैसे, डिस्क पर प्रोग्राम कोड्स को फाइलके रूप में स्टोर करना। वहीं प्रोसेस एक एक्टिव इन्टिटी है, जिसके साथ एक प्रोग्राम काउन्टर होता है, जो अगले इन्सट्रक्शन को एक्जिक्यूट करने को निर्दिष्ट करता है तथा प्रोसेस से संबंधित रिसोर्सेस का सेट होता है। केवल एक प्रोसेसर को कई प्रोसेसेस के बीच शिड्यूलिंग नीति द्वारा शेयर किया जा सकता है।

प्रोसेसेस हैरारिकीज़: जब कोई प्रोसेस क्रियेट होता है तो वह अन्य प्रोसेसे को क्रियेट करता है और फिर नये प्रोसेस अन्य प्रोसेस को क्रियेट कर सकते हैं। क्रियेटिंग प्रोसेस को पैरेंट प्रोसेस तथा नये प्रोसेस को उस प्रोसेस का चाइल्ड प्रोसेस कहा जाता है। इस प्रकार एक प्रोसेस द्वारा अन्य प्रोसेसेस को क्रियेट करने के कारण प्रोसेस ट्री का निर्माण होता है।

प्रोसेस स्टेट्स: किसी प्रोसेसे की जीवनावधि को कई पड़ावों में बांटा जा सकता है। ये पड़ाव किसी प्रोसेस के स्टेट्स कहे जाते हैं। जब कोई प्रोसेस एक्जिक्यूट करता है, तो उसका स्टेट परिवर्तित होता है। कोई प्रोसेस न्यू, रेडी, रनिंग, वेटिंग या टर्मिनेटेड में से किसी भी एक स्टेट में हो सकता है.

प्रोसेसर शिड्यूलिंग: शिड्यूलिंग का प्रमुख उद्देश्य, सीपीयू की उपयोगिता तथा सिस्टम की कार्य क्षमता को दिये गये समय में थ्रोपुट को बढ़ाना है। ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा प्रोसेस शिड्यूलिंग की प्रक्रिया शिड्यूलर द्वारा संपादित की जाती है। शिड्यूलर ऑपरेटिंग सिस्टम का एक प्रोग्राम या मॉड्यूल है, जो प्रोसेस को एक्जिक्यूट करने के लिए प्रोसेसे को जॉब क्यू से सिलेक्ट करता है। शिड्यूलर्स निम्न प्रकार के होते हैं
  • लॉन्ग टर्म शिड्यूलर
  • मिडियम टर्म शिड्यूलर
  • शॉर्ट टर्म शिड्यूलर
शिड्यूलिंग और परफार्मेंस क्राइटेरिया
  • सीपीयू यूटिलाइजेशन
  • थ्रोपुट
  • टर्नअराउण्ड टाइम
  • वेटिंग टाइम
  • रिस्पॉन्स टाइम
शिड्यूलिंग एल्गोरिदम
  • फर्स्ट-कम-फर्स्ट-सर्व्ड शिड्यूलिंग
  • शॉर्टकट-जॉब-फर्स्ट शिड्यूलिंग
  • राउण्ड-रॉबिन शिड्यूलिंग
  • प्रायोरेटी बेस्ड शिड्यूलिंग
  • मल्टीलेवल क्यू शिड्यूलिंग
डिस्क आपरेटिंग सिस्टम: हर छोटा-बड़ा कम्प्यूटर अपने आपरेटिंग सिस्टम के नियंत्रण में ही काम करता है। पीसी के लिए भी आपरेटिंग सिस्टम की जरूरत होती है। जो आपरेटिंग सिस्टम अपने काम में बार-बार डिस्क की मदद लेता है। उसे डिस्क आपरेटिंग सिस्टम या डॉस कहा जाता है । डॉस छोटे-बड़े हर तरह के कम्प्यूटर के लिए हो सकता है। आई.बी.एम. के पर्सनल कम्प्यूटरों के लिए माइक्रो सॉफ्ट नामक कम्पनी ने जो ऑपरेटिंग सिस्टम बनाया है उसे पर्सनल कम्प्यूटर-डिस्क ऑपरेटिंग सिस्टम या पीसी- डॉस कहा गया है। बाद में माइक्रो सॉफ्ट नामक कम्पनी ने सभई तरह के आईबीएम-पीसी कॉम्पैटीबल कम्प्यूटरों के लिए जो आपरेटिंग सिस्टम तैयार किया उसका नाम माइक्रो सॉफ्ट-डिस्क आपरेटिंग सिस्टम या एमएस-डॉस रखा। एमएस-डॉस के आदेश दो प्रकार के होते है
  • आन्तरिक आदेश: ये ऐसे आदेश है जो एमएस-डॉस की मुख्य फाइल Command.com में पहले से होते हैं क्योंकि ये सबसे महत्वपूर्ण हैं और बार-बार देने पड़ते हैं । ये आदेश कम्प्यूटर की मुख्य मेमोरी में हर समय उपलब्ध रहते हैं तथा इन्हें चलाने के लिए किसी और फाइल की आवश्यकता नहीं होती है इसलिए इन्हें आन्तरिक आदेश कहा जाता है। एमएस-डॉस संस्करण 6.0 के कुछ आन्तरिक आदेश हैं - BREAK, COPY, ERASE, LOADHIGH, RD, SHIFT, CALL CTTY, EXIT, MD, REM, TIME, CD, DATE, FOR, MKDIR, REN, TYPE, CHCP, DEL, GOTO, PATH, RENAME, VER, CHDIR, DIR, IF, PAUSE, RMDIR, VERIFY, CLS, ECHO, LH, PROMPT, SET, VOL इत्यादि. 
  • बाह्य आदेश: ये ऐसे आदेश हैं जे कम्प्यूटर की मुख्य मैमोरी में उपलब्ध नहीं रहते बल्कि अलग प्रोग्राम फाइलों के रूप में डिस्क पर रहते हैं। जैसे ही आप कोई बाह्य आदेश देते हैं, कमान्ड प्रोसेसर उसकी सम्बन्धित फाइल को डिस्क पर ढूंढता है और मिल जाने पर मैमोरी में लोड कर देता है। इसके साथ ही उस कमान्ड का पालन शुरू हो जाता है । इनको चलाने के लिए यह आवश्यक है कि इनका संस्करण वही होना चाहिए जो आपके एमएस-डॉस का है, नहीं तो ‘Incorrect Version’ अर्थात् ‘गलत संस्करण’ का संदेश आएगा और आदेश रद्द हो जाएगा। एमएस-डॉस के मुख्यबाह्य आदेश हैं - APPEND, DOSKEY, HELP, MOVE, SORT, ATTRIB, DOSSHELL, KEYB, MSAV, SYS, CHKDSK, EXPAND, LABEL, NLSFUNC, TREE, DELTREE, FASTOPEN, MEM, MSBACKUP, UNDELETE, DISKCOMP, FORMAT, MEMMAKER, PRINT, XCOPY, DISKCOPY, GRAPHICS, MORE, RESTORE इत्यादि.
AUTOEXEC.BAT: जब पीसी की बूटिंग की जाती है तो एमएस-डॉस रूट डायरेक्टरी में एक फाइल की खोज करता है। जिसका नाम है AUTOEXEC.BAT. यह एक बैच फाइल है, जिसमें कुछ ऐसे आदेश होते हैं, जिन्हें आप पीसी चालू करते ही उनका पालन कराना चाहते हैं। 
आभारी टी.डी.आई.एल.

3 comments:

  1. नीलाभ जी आपके ब्लॉग पर आज नजर पड़ी, मूल जानकारी वाला अच्छा ब्लॉग है | कृपया टेम्प फाईलों के बिषय में भी बताईयेगा पर यह सोच कर कि हम लोग वास्तव मे अंजान हैं बस वैसे ही जैसे घर में गाड़ी होती है उसे चलाना सिख गए हों वैसे ही कंप्यूटर चलाना सीख गए हैं और कभी कभी बहुत परेशां हो जाते हैं फिर फोर्मेट करने का तरीका भी बिलकुल बेसिक तौर पर बताना | बाकि मेरा ब्लॉग tensionpoint.blogspot.com है , उस पर आपका स्वागत है |

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  2. वाह गुरुदेव ! इतना विस्तार से और सरल भाषा में लिखने के लिये साधुवाद। इसी तरह धीरे-धीरे हिन्दी में सामग्री बढ़ जायेगी। लगे रहिये।

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  3. VERY GOOD SIR. YOUR DDFDFIS VERY NICE YOUR LANGUAGES VERY SIMPLE AND WITHOUT DIFFICULTY LANGUAGE.

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