Sep 1, 2010

बाहरी मुद्दे छोडिये, आंतरिक कलह देखिये

कहा जाता है की भारत में ऐसी काफी परेशानियाँ हैं जिनपर ध्यान देना चाहिए मसलन विदेशों के मुद्दे, शिक्षा, रोजगार, जनसँख्या इत्यादि लेकिन आज मैं जिस परेशानी की बात करने जा रहा हूँ उसके सामने तो ये कुछ भी नहीं है. बात है अधिकारों की, बात है स्वतंत्रता की और बात है आपसी मेल की.


क्या आपको नहीं लगता की बोम्बे (मुझे माफ़ करें, मैं यहाँ बोम्बे ही कहूँगा, मुंबई नहीं) को एक अलग राष्ट्र का दर्जा दे देना चाहिए. निकट समय में जो कुछ भी वहां हुआ है उससे तो मुझे यही लगता है. जो आन्दोलन ठाकरे परिवार चलने में जुटा है उसे एक मानसिक दिवालियापन हीं कहा जा सकता है. मुंबई सिर्फ मराठियों की है, इस बात का क्या मतलब है? क्या भारत में लोगों को एक राज्य से दुसरे राज्य जाने के लिए पासपोर्ट की जरुरत है? जिस तरह उन्होंने उत्तर भारतियों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ी है उससे तो लगता है आने वाले समय में यही होने वाला है.

मैं उनसे केवल एक बात पूछना चाहता हूँ की क्या उन्होंने कभी ये जानने की कोशिश की कि मराठी जनता क्या चाहती है? जिन मराठी भाइयों के हक़ कि वो बात कर रहे हैं इस पागलपन से सबसे ज्यादा नुक्सान उन्ही मराठी जनता को हो रहा है. वैसे इन सब बातों के लिए उनके पास समय कहाँ है, इसमें समय व्यर्थ करेंगे तो राजनीति कब करेंगे? भारत में ओछी राजनीती नयी बात नहीं है लेकिन ये तो घटियेपन कि हद है. किसी ने शायद ठीक ही कहा है कि भैंस के सामने बीन बजने का कोई फायदा नहीं है.

दुसरे तरफ ध्यान दीजिये, ठाकरे परिवार जो कर रहा है वो तो कर हीं रहा है लेकिन महाराष्ट्र के सरकार क्या कर रही है? क्या पानी सर के ऊपर निकल जाने के बाद वो कुछ करेगी? और किस चीज का इन्तेजार वो कर रही है? अगर सरकार ऐसे ही चलानी है तो इससे अच्छा कोई सरकार न हो तो बेहतर है. उनकी ये निकर्मन्यता तो देखने लायक है. जब भी ऐसे घटनाएँ होती है तो बड़े बड़े राजनेता इसकी निंदा कर के चुप हो जाते है, सवाल ये है कि इसके खिलाफ कदम कब उठाया जायेगा? अगर सरकार और प्रशाशन कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम जनता को बेवकूफ मत बनायें और साफ साफ कह दें.

अभी हाल में हीं उनका एक और बयान आया कि सिर्फ मराठी सीखने से काम नहीं चलेगा, महाराष्ट्र में पैदा होना जरुरी है. जैसे महाराष्ट्र उनकी बपौती है. ऐसे पागल लोगों को पागलखाने में डालने की अत्यंत आवशयकता है नहीं तो ये महामारी कल अन्य राज्यों तक भी पहुंचेगी. एक बात तो साफ़ है कि दो गुटों के आपसी कलह के कारण महाराष्ट्र की जनता बेवजह पिस रही है. अरे कम से कम उन मराठियों के बारे में तो सोचो जिनके हितों कि आप बात कर रहे है कि वो असल में चाहते क्या है?

अंत में मैं आप सब को ये बताना चाहता हूँ कि मैंने अपनी शुरुआती पढाई महाराष्ट्र में हीं कि थी और जीवन में मैंने अपने जो भी बेहतरीन मित्र कमाए हैं उनमे से कई महाराष्ट्र के हैं. हम आज भी संपर्क में है और इस तरह कि कोई भावना न हमारे बीच न है और न हीं भविष्य में आने कि सम्भावना है. क्षेत्र के ऊपर जो राजनीति हो रही है उसे बंद करना बहुत जरुरी है और प्रशाशन को इसके बारे में तुरंत कदम उठाने चाहिए.