Sep 1, 2010

क्या भारत में चर्चा के लिए केवल एक हीं खेल है?

अगर आपको लग रहा ही की मैं इस लेख में किसी खेल की बड़ाई या बुराई करने आया हूँ तो आप गलत सोंच रहे हैं. न हीं मैं किसी खेल का आलोचक हूँ और न ही किसी खेल का समर्थक. मुझे एक जरिया मिला जिससे मैं सारे देश तक अपनी बात पहुंचा सकूँ केवल इसलिए मैं ये लेख लिख रहा हूँ.

वैसे अब तक तो आप समझ गए होंगे की मैं किस खेल की बात कर रहा हूँ. कई लोग कहते हैं कि भारत में क्रिकेट धर्म है और खिलाडी भगवान. हमारे लिए ये गर्व कि बात है कि हमारी क्रिकेट टीम विश्व के श्रेष्ठ टीमों में से है लेकिन मैं आज आपको इसका दूसरा पहलु दिखाना चाहता हूँ.


ये बात तो हमें समझनी होगी कि भारतीय जनता "खेल" कि नहीं केवल "क्रिकेट" कि दीवानी है. ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि जहाँ कोई क्रिकेट खिलाडी केवल एक मैच के बाद हीरो बन जाता है वहीँ दुसरे खेलों के तथाकथित प्रसिद्ध खिलाडी जीवन भर अपने वास्तविक सम्मान और अधिकारों के लिए तरसते रहते हैं. यह सोच कर हंसी आती है राष्ट्रीय स्तर के क्रिककेट खिलाडी जहाँ पैसे और सम्मान से लदे रहते हैं वहीँ दुसरे खेलो के राष्ट्रीय खिलाडी सामान्य भत्तों के लिए जूझते रहते हैं. भारतीय क्रिकेट टीम कि हार और जीत जहाँ राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाती है वहीँ दुसरे खेलों के लिए सोंचने का भी वक्त हमारे पास नहीं है. क्रिकेट बिना किसी बात के सुर्खियाँ बटोरता रहता है वहीँ बांकी खेल इसके लिए इंतजार करते रहते हैं.

सवाल ये है कि परेशानी कहाँ है? क्रिकेट में ऐसे कौन से मोती जड़े हैं कि अंतर एवं भेदभाव कि इतनी बड़ी खाई पैदा हो गयी है? कुछ तो गलत हो रहा है ये निश्चित है. कुछ बातों पर ध्यान दें:
  • अगर भारतीय क्रिकेट टीम एक साधारण सा मैच भी जीत लेती है तो सरे समाचार पत्रों में और न्यूज चैनलों में उसकी विस्तृत चर्चा होती है. अगर आपने ध्यान दिया हो तो जैसे हीं कोई मैच ख़त्म होता है वैसे हीं लगभग सारे न्यूज चैनलों पर कई पुराने खिलाडी उसकी चर्चा करने के लिए उपस्थित रहते हैं. ऐसा पागलपन और कहीं देखा है? जब बांकी खेलों के बारे में केवल "खबर" दी जाती है तो केवल क्रिकेट के लिए "कार्यक्रम" क्यों पेश किया जाता है?
  • कितनी मजेदार बात है कि युवराज सिंह अगर छह छक्के मरता है तो उसे लाखों करोड़ों कि धनराशी मिल जाती है और कोई खिलाडी अगर ओलम्पिक में पदक लाता है तो उसे एक सम्मान पत्र और पचास हजार से संतोष करना पड़ता है.
  • क्या ये सही है कि धोनी अगर अपने बाल कटवाता है तो सारे न्यूज चैनल उसे ब्रेकिंग न्यूज बना कर दिखाते है और कोई अन्य खिलाडी अगर मर भी जाये तो शायद श्रधांजलि भी नहीं मिलती.
  • क्रिकेट वर्ल्ड कप जीत के अगर पच्चीस साल पूरे होते हैं तो खिलाडियों के सम्मान में जलसा होता है. उन्हें पैसों और सम्मान से लाद दिया जाता है लेकिन होक्की के स्वर्णिम दिनों को कौन याद करता है?
गलती कहाँ है? सरकार के रवैये में, व्यास्था में या कहीं और? गलती हमारे अन्दर हीं है. परिवार में किसी एक सदस्य पर पूरा प्यार और सम्मान उंधेल दिया जाये तो बाकी के सारे सदस्य कुंठित हो जाते हैं. हमारा देश खुद अपने हाथ से अन्य खेलों को हीन भावना के समंदर में धकेल रहा है. या तो देश, सरकार और हम अन्य खेलों और खिलाडियों के साथ सौतेला व्यवहार बंद करें या फिर अपने बेहतरीन खिलाडियों का पतन देखने के लिए तैयार हो जाएँ.

अंत में मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि अब सरकार और प्रबंधन अन्य खेलों के लिए क्या करता है ये उनपर छोड़ दे, हमारा नजरिया अन्य खेलों और खिलाडियों के लिए कैसा है वो महत्वपूर्ण है. मैं सबसे खासकर मीडिया से ये अपील करता हूँ कि ये सौतेला व्यवहार बंद करें, ये सब ख़त्म होना हीं चाहिए. अनेकता में एकता ये हमारे देश का आधार है. क्रिकेट का महत्व अपनी जगह है लेकिन बांकी खेलों और खिलाडियों को वो सारी चीजें मिलनी हीं चाहिए जो उनका अधिकार है.