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Wednesday, September 1, 2010

भविष्य में क्या होना है, "सरकार" हीं जाने

एक समय था जब कहा जाता था की दाल रोटी खाओ और प्रभु के गुण गाओ, लेकिन आज उसी दाल रोटी ने हमारा जीना मुश्किल कर दिया है. पिछले दिनों में महगाई जिस रफ़्तार से बढ़ी है उसे देख कर तो भविष्य का अनुमान लगाना मुश्किल है. अभी तो हम सिर्फ उन परेशान लोगों की बात कर रहे है जो आर्थिक रूप से सामान्य हैं, उन लोगों के बारे में हम सोच भी नहीं सकते है जो की गरीबी रेखा से नीचे हैं. आज महगाई अगर हमारे माथे पर शिकन ला रही है तो उन लोगों के साथ क्या हो रहा होगा ये अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है.

सवाल ये है की आखिर ये गति कहाँ जा कर रुकेगी? महगाई जिस तेजी से बढ़ी है उसपर सरकार का रुख उदासीन क्यों है? हम जानते है की खाद्य मंत्री एवं अन्य मंत्रियों को खाद्य पदार्थ की कोई कमी नहीं होगी लेकिन आम जनता का कष्ट समझने के लिए वो और किस चीज का इन्तेजार कर रहे हैं? इन सब के ऊपर माननीय खाद्य मंत्री जिस तरह से बयानबाजी कर रहे उसे देख कर तो यही लगता है कि न तो उन्हें आभावों को समझने कि आदत है और न हीं बांकी लोगों कि परेशानियों से कोई सरोकार.

सरकार के रुख को देख कर तो यही लगता है कि अब वो बस लूट-पाट का इन्तेजार कर रहे है. उसपर उनका ये बयान कि चीनी महगी हो गई है तो उसे खाना कम कर दे उनकी अकर्मण्यता को दर्शाता है. अगर वे अपना काम और कर्त्तव्य ठीक ढंग से नहीं निभा सकते, तो बेहतर है कि घर पर बैठें और किसी ऐसे व्यक्ति को ये जिम्मा सौपे जो इसे बेहतर ढंग से सम्भाल सके.

बात सिर्फ यही नहीं है, अगर कीमतें बढ़ रहीं है तो सरकार को जनता को उचित कारण बताना चाहिए और ये भी कि आगे के लिए उनकी कार्य प्रणाली क्या होगी. जनता के जवाबों से मुह छुपाने से कोई फायदा नहीं होगा. आम जनता को इससे कोई मतलब नहीं है कि आपकी बैठकों में क्या होता है? परिणाम अगर कुछ नहीं है तो आपका कोई भी बयान और आपकी कोई भी बैठक आपको नहीं बचा सकती.

कहा जाता है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र है और भारत की जनता उसका सबसे शक्तिशाली हिस्सा है, लेकिन हमारी ताकत बिलकुल एकतरफ़ा है. जब हम हीं सरकार चुनते है ताकि वो हमारे भले के बारे में सोच सके तो हमें ये अधिकार क्यों नहीं है कि जब वो सरकार और सरकारी अफसर निकम्मे साबित हो तो हम उनकी कुर्सी छीन सकें? ये बड़ी विडम्बना की बात है कि हम अपने देश का सबसे मजबूत स्तम्भ होते हुए भी कुछ नहीं है.

अंत में केवल इतना कहना चाहूँगा कि जनता में गुस्सा बहुत है, उसे आजमाना बंद करें. इसकी बजाय अगर सरकारी कर्मचारी और मंत्री अपने कर्त्तव्य का ठीक तरह से निर्वाह करे तो वो उनके और देश दोने के हित में होगा.

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