Oct 12, 2010

प्रॉक्सी साइट्स

आपका मनचाहा यूआरएल अभी खुल नहीं सकता। आपका निवेदन अस्वीकार किया जाता है। इस तरह की समस्याओं से हम सभी को दो-चार होना पड़ता है जब हम ऑफिस से या अन्य किसी जगह से ट्वीटर, यू-ट्यूब, ऑर्कुट या अन्य किसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स को खोलने की कोशिश करते हैं। कई कंपनियों ने इन वेबसाइट्स के उपयोग पर रोक लगा दी है और कुछ ने तो मैसेंजर सर्विस व जेनरिक ई-मेल सर्विस जैसे जीमेल, याहू तक के उपयोग को  कार्यालयीन समय में बंद कर दिया है। यह कदम कंपनियों को इस वजह से उठाने पड़े हैं क्योंकि कंपनी एम्प्लाई द्वारा अपना ज्यादातर समय काम में न लगाते हुए सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ही बिताया जाता है।

यद्यपि आजकल के तकनीकी दौर में यह बहुत मुश्किल है कि किसी भी चीज की कोई सीमा तय की जा सके और वह भी विशेजाकर `इंटरनेट' की। यहीं से प्रॉक्सी साइट्स या किसी भी साइट्स से मिलती जुलती अन्य साइट्स की एक अलग दुनिया की शुरुआत होती है। वर्तमान में ज्यादा से ज्यादा लोग  बड़े मजे से ठीक अपने ऑफिशियल नेटवर्क की नाक के नीचे इन प्रॉक्सी वेबसाइट्स का उपयोग नेट पर मनचाही सामग्री को खोजने के लिए करते हैं जिसमें खीज उत्पन्न करने वाले ऑनलाइन विज्ञापन बार-बार कम्प्यूटर क्रीन पर आकर कार्य को बोझिल बनाते रहते हैं। जब व्यक्ति प्रॉक्सी साइट्स का उपयोग करता है तब उसके लिए न सिर्फ इंटरनेट की दुनिया का संसार खुलता है बल्कि समस्याओं का पिटारा भी वह अपने लिए लेकर आता है। इन साइट्स पर ``फिशिंग'' करने वाले ई-मेल एकाउंट को क्षति पहुंचाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, जिसमें आपकी व्यक्तिगत जानकारियों के भी चोरी हो जाने का डर हरदम बना रहता है। इंटरनेट सर्फिंग के दौरान आपको किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, जैसे प्रॉक्सी साइट्स के उपयोग से आपके व्यक्तिगत डाटा के चोरी होने, उसे क्षति पहुंचने व सुरक्षा संबंधी नियमों के उल्लंघन का खतरा हमेशा बना रहता है। इसके अलावा आप पर ``फिशिंग'' अटेक भी हो सकता है। ``फिशिंग'' ऐसी छद्म कार्यशैली होती है जिसमे इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन के माध्यम से अपराधिक गतिविधियों को संचालित कर किसी भी व्यक्ति के यूजरनेम, पासवर्ड, व्यक्तिगत डाटा व अन्य जरूरी जानकारियों के बारे में मालूमात की जाती है। सुरक्षा विशेजाज्ञों ने प्रॉक्सी हब साइट्स के उपयोग को सभी के लिए एक बड़ा खतरा बताया है। इसमें हमेशा संदेह बना रहता है कि किसी थर्ड-पार्टी के प्रॉक्सी सर्वर के उपयोग से किसी व्यक्ति द्वारा हानि पहुंच सकती है या नहीं, इसमें विभिन्न एकाउण्ट्स में रखे गए यूजर नेम व पासवर्ड भी शामिल हैं। साइबर अपराधी इतने शातिर होते हैं कि वे प्रॉक्सी सर्वर तक निर्माण कर सकते हैं ताकि उपयोगकर्ता को झूठा वेब पेज दिखाया जा सके। केस्पर स्कॉय लेब की ग्लोबल रिसर्च व एनॉलिसिस टीम के मुख्य सुरक्षा विशेजाज्ञ एलेक्स गोर्स्टव कहते हैं कि जो वेब पेज हम देखते हैं उसके लिए किसी साधारण उपयोगकर्ता के लिए यह सुनिश्चित करना कि वह वेबपेज असली है या नकली, बहुत ही मुश्किल कार्य होता है।

प्रॉक्सी वेबसाइट्स की मॉनीटरिंग करना बहुत ही मुश्किल काम होता है। इन साइट्स की मदद से हैकर्स इंटरनेट उपयोगकर्ता के गोपनीय डाटा को बड़ी आसानी से चुरा सकते हैं। इस वजह से अब बहुत सी कंपनियों ने डिक्रिप्शन टूल्स का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है ताकि प्रॉक्सी वेबसाइट्स को मॉनीटर किया जा सके। लेकिन इन सब ऐहतियात के बावजूद भी हैकर्स डाटा चुराने के नए-नए रास्ते निकाल लेते हैं। सुरेन्द्र सिंह आगे बताते हैं कि हैकर्स व प्रॉक्सी वेबसाइट्स डेवलपर्स की अपनी स्वयं की एक टीम व ग्रुप होता है जिन्हें तमाम आधुनिक सुविधाएं मुहैया होती हैं तथा इनकी टीम किसी भी तकनीकी समस्या की तुलना में तकनीकी रूप से अधिक उन्नत होती है। इसलिए कंपनियां इन प्रॉक्सी वेब साइट्स पर रोक लगाने के लिए जो तरीके ढूंढती है, उनके कामयाब होने पर भी हमेशा संदेह बना रहता है।

वे कंपनियां जिन्होंने कार्यालयीन समय के दौरान एंप्लाईज के सोशल नेटवर्किंग साइट्स, जीमेल अथवा मेसेंजर सर्वर, जेनरिक ईमेल के उपयोग पर रोक लगा दी है, वे यह मानती हैं कि उनके कुछ एम्प्लाईज निश्चित दायरे में रहते हुए इन सेवाओं का उपयोग करते हैं। नामी मीडिया संस्थानों के मुख्य तकनीकी अधिकारी कहते हैं कि जरूरी कदम उठाने के बाद कुल उपयोगकर्ताओं में से अब लगभग 10% उपयोगकर्ता ही इन प्रॉक्सी साइट्स का उपयोग करते हैं और इंटरनेट के 90% उपयोगकर्ताओं को हम इन साइट्स से दूर रखने में कामयाब हुए हैं। आगे चलकर जब इन 10 प्रतिशत उपयोगकर्ताओं को भी इस बात का अंदाजा हो जाएगा कि इन प्रॉक्सी वेबसाइट्स का इस्तेमाल यूजर के निजी डाटा के लिए कितना खतरनाक है तो वे भी इनका उपयोग करना पूरी तरह से छोड़ देंगे। तकनीकी अधिकारी आगे कहते हैं कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स का उपयोग करने वाले उपयोगकर्ताओं का नेटवर्क बहुत बड़ा हो गया है। इस कारण इसका उपयोग ज्यादातर व्यावसायिक उपयोग के लिए होना चाहिए। वेबसाइट्स पर रोक लगाकर भी हम कंपनी पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम कर सकते हैं।

सलाह प्रदाता कंपनी केपीएमजी के एक्जीक्यूटिव निदेशक नितिन खानापुरकर कहते हैं कि आखिर ऐसी क्या वजह है कि कंपनी एम्प्लाइज को ऐसी साइट्स का उपयोग करने से रोका जाता है? प्रतिबंध को दो स्तरों पर देखा जा सकता है। पहला कंपनी की सुरक्षा की दृष्टि से, ताकि कंपनी की निजी अहम जानकारियां इंटरनेट पर सार्वजनिक न हो सकें तथा किन्हीं गलत व्यक्तियों के हाथ में यह जानकारी न लग सकें। दूसरा मुद्दा कार्यकुशलता का है। यदि लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपना ज्यादातर समय बिताते हैं और नेट पर सर्फ करते रहते हैं तो ऐसा माना जाता है कि इससे कंपनी की परफार्मेंस पर बुरा असर पड़ता है।

एसोकॉम सोशल डेवलपमेंट फाउंडेशन द्वारा दिसंबर 2009 में एक सर्वे किया गया था। इसमें बहुत सी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं। यह तथ्य विभिन्न शहरों जैसे दिल्ली, बंगलौर, चैन्नई, मुंबई, कोच्चि, चंडीगढ़, अहमदाबाद, पुणे, लखनऊ व कानपुर के लगभग 4000 कार्पोरेट एम्प्लाइज के साक्षात्कार से जुटाए गये हैं। सर्वे में यह पता चला कि प्रत्येक एम्प्लाई अपने पूरे दिन का लगभग 1 घंटा सोशल नेटवर्किंग साइट पर बिताता है। इससे उसकी कार्य- क्षमता पर 12.5 प्रतिशत प्रभाव पड़ा। यह तथ्य भी सामने आया कि 19 प्रतिशत कंपनियों के एम्प्लाईज को सोशल नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल करने की इजाजत इसलिए दी गई कि वे इसका उपयोग केवल बिजनेस से जुड़े कार्यों के लिए ही करें। जबकि 16 प्रतिशत कंपनियों ने व्यक्तिगत उपयोग (वह भी सीमा में रहते हुए) की इजाजत दी। जबकि 40 प्रतिशत एम्प्लाईज ने यह स्वीकारा कि उनकी कंपनी उन्हें कार्यालयीन समय के दौरान भी पूरी तरह सोशल नेटवर्किंग साइट्स का उपयोग करने की अनुमति देती है। यद्यपि बहुत से लोगों का कहना है कि प्रॉक्सी साइट्स पर रोक लगाने से कोई फायदा नहीं होगा, जब तक कि उपयोगकर्ता स्वयं इसका उपयोग करना चाहते हैं। इसलिए सारे नियम व्यर्थ हो जाते हैं। क्योंकि जब उपयोगकर्ता इंटरनेट का उपयोग करते हैं तो वे अपनी पसंद  की वेबसाइट्स पर काम करने के लिए  कोई न कोई रास्ता ढूंढ लेते हैं। नीतियां एम्प्लाईज के लिए एक प्रकार का मानक तय करती हैं। इससे एम्प्लाईज के बीच यह संदेश जाता है कि कंपनी अपने ही एम्प्लाईज पर भरोसा नहीं करती है। डी एम सी इंटरनेशनल के सीईओ गौरव मित्तल कहते हैं कि वे कंपनियां जिन्होंने इंटरनेट के आने के बाद अपना विकास किया है उनमें किसी प्रकार की सीमाएं तय नहीं की जाती हैं।

एम्प्लाईज इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं देते कि प्रॉक्सी वेबसाइट्स के उपयोग से किसी प्रकार का कोई खतरा भी हो सकता है। इस कारण वे कंपनी की नीतियों को भी नजरअंदाज करते हैं। आज आप किसी पर भी बंदिश नहीं लगा सकते हैं क्योंकि वैकल्पिक साधनों को लेकर सभी पर्याप्त रूप से जागरूक हैं। कंपनी द्वारा इस तरह की नीतियों को बनाने का अर्थ ऐसा है जैसे हम स्वयं को ही बेवकूफ बना रहे हैं।

बहुत से विशेजाज्ञों का मत है कि यूं तो एम्प्लाइज के पास बहुत से विकल्प मौजूद हैं लेकिन कंपनियों को भी प्रॉक्सी साइट्स पर रोक लगाने वाली नीतियां नहीं बनानी चाहिए। ऑफशोर प्रोडक्ट डेवलपमेंट कंपनी ग्लोबल लॉजिक के एसोसिएट वाइस प्रेसीडेंट दीपक गुप्ता कहते हैं कि इंटरनेट पर की जाने वाली गतिविधियां किसी के अनाधिकार प्रवेश से अलग होती हैं। हमारी कंपनी ने किसी वेबसाइट के उपयोग को प्रतिबंधित नहीं किया है। क्योंकि हमें भरोसा है कि एम्प्लाइज प्रॉक्सी वेबसाइट्स का उपयोग करने के अन्य प्रॉक्सी सर्वर कहीं न कहीं से ढूंढ ही लेंगे। वे आगे कहते हैं कि कंपनियों के इस तरह के हस्तक्षेप करने वाली आई टी नीतियों पर पूरी तरह से रोक लगनी चाहिए। खानपुरकर भी इस पर सहमति जताते हुए कहते हैं कि जो भी कंपनियां इस तरह के नियम बनाकर प्रॉक्सी साइट्स पर रोक लगाना चाहती हैं, वहां एम्प्लाइज ऐसी साइट्स को नए तरीके से खोज लेते हैं। जबकि कंपनियों को ऐसे मुद्दों पर अपने स्टाफ को जागरूक बनाने की नीतियों पर अमल करना चाहिए ताकि एम्प्लाइज को प्रॉक्सी साइट्स का उपयोग करने की आवश्यकता ही महसूस न हो। प्रतिबंध लगाना ऐसी समस्याओं का कोई हल नहीं होता है। जब कोई दोस्त आपको फोन लगाता है तो क्या आप कार्यालयीन समय में उसका कॉल रिसीव नहीं करते हैं, यह भी तो एक प्रकार से सोशल नेटवर्किंग है। तो क्या आने वाले समय में कंपनियां कार्यालयीन समय में सेल फोन के इस्तेमाल पर भी रोक लगा देंगी। इस तरह के मुद्दों से निपटने के आखिर और कौन-कौन से रास्ते हो सकते हैं। कंपनियां कार्यालयीन समय के दौरान ऐसे समय का निर्धारण कर सकती हैं जब एम्प्लाइज कुछ समय के लिए सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स का उपयोग कर सकें।

ऐसे समय में ग्लोबल लॉजिक कुछ नया करने का प्रयास कर रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर रोक लगाने की जगह उन्होंने इसे अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने का एक मंच बना लिया है। इसे उन्होंने नाम दिया है ``ग्लो''। यह साइट फेसबुक की तरह कार्य करती है। साथ ही इसका निर्माण इस तरह से किया गया है कि यह कंपनी के एम्प्लाइज को सोशल मीडिया वेबसाइट्स के उपयोग करने से रोकती है। तो जब इस मुद्दें पर सभी के बीच में वाद-विवाद की स्थिति बनेगी तब एम्प्लाइज के पास करने के लिए सिर्फ तीन रास्ते ही रह जाते हैं। पहला  - वह ऑफिस में ट्विटर, फेसबुक व अन्य सोशल नेटवर्किंग का उपयोग न करे, दूसरा - अपने फोन के माध्यम से इंटरनेट का उपयोग करे और तीसरा - प्रॉक्सी साइट्स के खतरों को जानते हुए भी इसका उपयोग करें। तीनों में से कौन सा रास्ता चुनना है आप पर निर्भर है।
आभारी एलेक्र्तोनिकी आपके लिए