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Monday, August 29, 2011

अभी तक हम अन्ना के संघर्ष का मर्म नहीं समझ पाए हैं

आज मैं इंडिया गेट से आ रहा हूँ. पूरे १२ दिनों के बात जब अन्ना ने अपना अनशन ख़त्म किया तो सारे देश के साथ मैंने भी चैन की सांस ली. हालांकि जितने व्यापक तौर पर इस आन्दोलन में लोगों ने हिस्सा लिया शायद मैं नहीं ले पाया पर इस बात का सुकून तो है कि आंशिक तौर पर ही सही मैं इस बदलाव का साक्षी तो रहा हीं. जब इस आन्दोलन के सफलतापूर्वक समाप्ति पर इंडिया गेट पास सभी का आह्वाहन किया गया तो रुका नहीं गया. गया तो वाकई प्रसन्न मन से था लेकिन वापसी के बाद कुछ ठीक नहीं लग रहा.

जब इंडिया गेट पहुंचा तो जश्न का माहौल था. सारे लोग ख़ुशी के मारे नाच रहे थे, गा रहे थे और चिल्ला रहे थे. मैं भी उनमे शामिल हो गया. बड़ा अच्छा लग रहा था. दरअसल माहौल इतना केन्द्रित था कि दूसरी ओर देखने या धयान देना का मौका ही नहीं मिल रहा था पर जब दूसरी ओर ध्यान दिया तो कुछ और ही चीजों का पता चला. कई जगह लोग सिर्फ इसलिए चिल्ला रहे थे क्योंकी कैमरा उनकी ओर था. जैसे ही कैमरा उनकी ओर से हटता था तो उनका उत्साह भी क्रमश कम होता जाता था. मेरे लिए ये नई बात नहीं थी इसलिए इनपर मेरा ज्यादा ध्यान नहीं गया. 

भीड़ काफी ज्यादा होने की वजह से स्वाभाविक था की बेचने वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही थी. मैंने भी सोचा की चलो कुछ खा पी लिया जाए. जब मैं वहां पहुंचा तो पता चला की सारी चीजों के दाम आम दिनों से दुगुने हैं. यहाँ तक की पैक किए गए चीजों के अधिकतम मूल्य की जगह पर खुरुच दिया गया था या रंग दिया गया था. लोग बड़े धड़ल्ले से उन चीजों को खरीद रहे थे. ये जानते हुए कि उनके दाम बहुत ज्यादा है और उनसे गलत मूल्य वसूल किया जा रहा है, बिक्री में कोई कमी नहीं थी.

मैं बता नहीं सकता कि ये देख के कितना दुःख हुआ. ये वही लोग हैं जो कुछ दिनों पहले तक महंगाई को ले कर बवाल मचा रहे थे. ये वही लोग हैं जो ये आशा कर रहे हैं की जन लोकपाल बिल आने से उनकी स्थिति में सुधर होगा. ये वही लोग हैं जिन्होंने अन्ना के कंधे से कन्धा मिला कर इस आन्दोलन में उनका साथ दिया. 

क्या फर्क पड़ता है अगर १० रूपये की चीज २० रूपये में मिल रही है? अगर आपको इससे फर्क नहीं पड़ता तो फिर क्यों फर्क पड़ता है जब यहाँ के भ्रष्ट नेता आपकी कमाई का पैसा विदेशों में ले जाकर अपनी तिजोरियां भरते हैं? आपको १० और २० में फर्क नहीं पड़ता पर उस समय जरुर फर्क पड़ेगा जब १००००० रूपये की चीज २००००० में मिलेगी. कितने आश्चर्य की बात है की लोग भ्रष्टाचार के मिटने के जश्न में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं. हजारों अन्ना आपके लिए भूके रह कर मर जाएंगे पर कुछ नहीं होगा जबतक हम खुद इस बदलाव को महसूस नहीं करेंगे.

ऐसा नहीं है की पुलिस या नगर निगम को इसकी जानकारी नहीं होगी लेकिन अगर इन्हें जनता का जरा भी ख्याल रहता तो ऐसे आन्दोलन की नौबत ही नहीं आती. क्या करूँ बहुत ही असहाय महसूस कर रहा हूँ. देश के भ्रष्ट नेता हमें क्यों नहीं लूटेंगे जब वो जानते हैं की हम हमेशा लुटने के लिए तैयार रहते हैं. जब धांदली  इतने नीचे के स्तर पर है तो हम ये कैसे अपेक्षा कर सकते हैं की ऊपर वाले हमें छोड़ देंगे. 

सवाल ये है कि हम क्या कर सकते है? कई चीजें ऐसी होती हैं जिनपर हमें ही विरोध प्रकट करना पड़ता है. अगर वो गलती कर रहा है तो मैं उसे मार तो नहीं सकता लेकिन उसकी चीजों को खरीद कर उन्हें बढ़ावा भी नहीं दूंगा. जी हाँ दोस्तों बहिष्कार कीजिये उन सभी चीजों का जो वाजिव नहीं है. एक एक व्यक्ति के द्वारा लिया गया कदम हीं बदलाव ला सकता है. मैं ये अपेक्षा नहीं कर सकता कि अगर मैं इसका बहिष्कार कर रहा हूँ तो बांकी लोग भी करें. वे अपने जीवन के फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है. जरुरी ये है कि आप औरों को छोड़े और अपना निर्णय लें. हमें ये समझना पड़ेगा कि ऐसा कर के हम उस अन्ना का सबसे बड़ा अपमान कर रहे है जिसके लिए हम इतना ताम झाम कर रहे हैं. सिर्फ सर पर "मैं अन्ना हूँ" लिख लेने से आप अन्ना नहीं बन जाएँगे, उसे अपने जीवन में उतारना पड़ेगा.

ज्ञान कहा से मिल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता. जीवन भर मुझे गाँधी जी का असहयोग आन्दोलन समझ में नहीं आया और आज एक आइसक्रीम वाले ने मुझे समझा दिया. वक्त आ गया है कि आप भी इस आन्दोलन में कूद पड़ें जो आपसे ही शुरू होता है और आप पर ही ख़त्म. जय हिंद.

1 comment:

  1. It’s very sad. You have written a very insightful and factual article. We can only hope and wish that this historical movement could change the thinking of our society and instill some ethics in it.

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