Nov 17, 2011

स्वजनों के बिछड़ने और मिलने की कहानी - "पुनर्नवा"

कुछ समय पहले मैंने श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की "बाण भट्ट की आत्मकथा" पढ़ी थी. उसके बाद ही मुझे उनके द्वारा रचित साहित्य पढने की उत्कंठा थी. जहाँ तक मैं द्विवेदी जी के लेखन को समझ पाया हूँ, उनके जैसा प्रवाह शायद ही किसी के पास है और अगर बात ऐतिहासिक विषयों कि हो तो वे अद्वितीय हो जाते हैं. ये बात जरुर है कि उनके लेखन का स्तर काफी ऊँचा है और उसे समझने के लिए हिंदी का पर्याप्त ज्ञान होना आवश्यक है और यही कारण है कि उनके पाठकों का एक विशेष वर्ग है और मुझे गर्व है कि मैं उसमे हूँ.

पिछले कुछ दिनों से मैं "पुनर्नवा" पढने में व्यस्त था और आज मैंने उसे समाप्त किया. उद्वेलित हूँ, हर्षित हूँ और उसी उपन्यास के बारे में सोच रहा हूँ. एक एक पृष्ठ जो मैंने पढ़ा, ऐसा लगता है जैसे मैं उसे जी चुका हूँ. कहानी लगभग १६०० वर्ष पहले कि है जब समुद्रगुप्त का शाषण था और राजनीती तेजी से बदल रही थी. 

इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि ये कई भागों में बटी है और सारे भाग धीरे धीरे आपस में जुड़ते हैं. पाठक की उत्सुकता बनी रहती है की आगे क्या होने वाला है. ऐसा लगता है की सारे भाग धीरे धीरे केंद्र में सरक रहे हैं और उपन्यास की समाप्ति के साथ उनकी यात्रा भी समाप्त हो जाती है. कहानी के सारे मुख्य पात्र विशिष्ट हैं और सारी कहानी अपने आप में जैसे उनकी आत्मकथा है. देवरात, मंजुला, आर्यक, मृणालमंजरी, श्यामरूप, चंद्रा, देवक सभी हल्द्वीप से अपने अपने भाग की यात्रा करते हैं और द्विवेदी जी ने बड़ी सुन्दरता के साथ सभी को  मथुरा में एक एक करके मिलवाया है.

सभी की यात्रा का वृतांत बेहतरीन है और उनकी यात्रा में कई सारे पात्र भी आकर जुड़ते रहते हैं. सबसे अच्छी बात ये है की इस उपन्यास में एक नहीं, दो नहीं बल्कि तीन प्रेम कथा भी छुपी है जो कि कहीं भी उपन्यास से अलग नहीं नजर आती. अनोखी बात ये भी है कि इन तीनो में से केवल एक प्रेम अपनी पराकाष्ठा तक पहुँचता है लेकिन फिर भी तीनों कथा अपने आप में पूर्ण है. चाहे वो देवरात और मंजुला का अनकहा, अस्पृश्य प्रेम हो, श्यामरूप और मदनिका का ह्रदयस्पर्शी प्रेम हो या आर्यक, मृणाल और चंद्रा का प्रेम त्रिकोण हो, पाठक हरेक समय उनके पवित्र प्रेम से अनुभूत होता है.

द्विवेदी जी के उपन्यास में कमी निकालने का सहस तो मुझमे नहीं है लेकिन फिर भी कुछ बातें है जो कहना चाहूँगा. सबसे पहले तो भाषा का स्तर बहुत ऊँचा है जो सभी लोगों के समझ के बाहर है. पात्रों की संख्या बहुत अधिक है और अगर आप सावधान न हों हो कथा में भटकने का डर है. जब कहानी ख़त्म हो जाती है तो भी लगता है जैसे कुछ बांकी रह गया. आर्यक, मृणाल और चंद्रा तो मिल जाते है लेकिन श्यामरूप और मदनिका की कहानी अधूरी छूट जाती है. ये देखना सुखद रहता कि श्यामरूप मदनिका को लेकर हल्द्वीप कैसे लौटता है और उसका मृणाल और चंद्रा से परिचय किस रूप में होता. समुद्रगुप्त का भावी अभियान और आर्यक के साथ उसका सम्बन्ध भी अधूरा लगता है और सबसे जरुरी समुद्रगुप्त के साम्राज्य में श्यामरूप की क्या भूमिका होती, ये सारी बातें अनिर्णित रह जाती है. शायद द्विवेदी जी ने ये पाठकों के ऊपर ही छोड़ दिया है.

खैर, अंत जो भी हो "पुनर्नवा" जैसे उपन्यास को पढना और उसका अनुभव बाटना अपने आप में ही एक उपलब्धि है. अगर आप एक बेहतरीन ऐतिहासिक उपन्यास पढने की सोच रहे हैं तो "पुनर्नवा" एक श्रेष्ट विकल्प है.