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Monday, January 30, 2012

मेलुहा के मृत्युंजय - मौलिक एवं दिलचस्प

अभी अभी मैं अमीश की "मेलुहा के मृत्युंजय" पढ़ का उठा हूँ. ये भगवान शिव पर आधारित तीन उपन्यासों की पहली कड़ी है. ये किताब पहले ही बेस्ट सेलर के रूप में मशहूर हो चुकी है और मैं ये कहना चाहता हूँ की वाकई ये पुस्तक बेस्ट सेलर होने के काबिल है. इसलिए नहीं की ये बेहतरीन है बल्कि इस लिए की ये वाकई मौलिक कथा है. 

पहली बात तो ये की इसे एक पौराणिक उपन्यास के रूप में प्रचारित किया गया था लेकिन भगवान शिव के जीवन पर आधारित होने के बावजूद इसे पौराणिक उपन्यास नहीं माना जा सकता. दूसरी बात कि इस उपन्यास को लिख कर अमीश ने बहुत सहस का परिचय दिया है क्योंकि इस उपन्यास के पात्रों एवं घटनाओं कि तुलना यदि मूल पुराणों से कि जाए तो जबरदस्त विरोधाभास का एहसास होता है. हालाँकि पात्रों के नाम वही हैं जो हम वेद पुराणों में पढ़ते है पर घटनाएँ पूरी तरह अलग है और भारत जैसे देश में धर्म की सारी मान्यताओं को किनारे रख अपनी ही कहानी लिख देना वाकई सहस का काम है.

कहानी लगभग दो सहस्त्राब्दी पुरानी है जिसमे ये बताया गया है की तिब्बती पठारों की पिछड़ी जाती का नेता कैसे एक विकसित सभ्यता का नायक बन जाता है. अगर आपमें से किसी ने भी प्रसिद्ध हौलीवूड फिल्म 10000 BC देखी है तो मेरे विचार में वे दोनों में कमाल की समानता का अनुभव करेंगे. इसमें शिव युवा, मजाकिया, उदंड एवं जिज्ञासु है जिसे योजनाबद्ध तरीके से उसके कबीले से पूर्ण विकसित देवताओं की नगरी में लाया जाता है जहाँ परिस्थितिवश उसे भगवान मान लिया जाता है.

कहानी सरल है और कहीं से ये नहीं लगता की हम कोई पौराणिक उपन्यास पढ़ रहे है क्योंकि किसी भी चमत्कार की इसमें कोई गुंजाईश नहीं है. हमारी पौराणिक कथाओं की तरह ही इसमें सारे पात्र है: शिव, नंदी, वीरभद्र, दक्ष, सती, ब्रहस्पति, दिलीप, भागीरथ इत्यादि लेकिन इनका आपसी सम्बन्ध विचित्रताओं से परिपूर्ण है जो कहीं से भी हमारे पौराणिक कथाओं से नहीं मिलते. यही एक चीज बहुत खटकती है और बेसिरपैर भी लगती है पर ये भी सच है की इन्ही के कारण ये उपन्यास एक मौलिक एवं मनोरंजक उपन्यास बन जाता है.

कुछ चीजें खटकती भी है. पहला तो घटनाएँ एवं पात्र जैसा की मैंने ऊपर कहा है. कहानी को आधुनिक एवं चमत्कार रहित बनाने के चलते लेखक ने सारी चीजों को वैज्ञानिक दृष्टि से दिखाया है और यही मुझे एक कमजोर कड़ी लगी. विज्ञानं के मूलभूत सिद्धांत हमेशा एक से होते है लेकिन सारी चीजों को आज के युग के साथ जोड़ने के चक्कर में लेखक ने सारी परिस्थिति आज के युग के जैसी ही रखी है जो हजम नहीं होती. तकनीक में लगातार सुधार एवं प्रगति होती रहती है इसलिए जरुरी नहीं है की जो तकनीक हम आज के युग में इस्तेमाल करते है वही चीजें हम २००० साल पहले भी करते होंगे. कई जगह शब्दों का चुनाव गलत है. हेक्टेयर, मिनट, यार, वर्जिश जैसे शब्द खटकते है. शिव के मुह से द्विअर्थी वाक्य तथा कुतिये का पिल्ला जैसी चीजें सुनना अखरता है.

चुकी कहानी तीन हिस्सों में है इसलिए कई चीजें समझ में नहीं आती. चुकी ये पहला अंक है इसलिए लेखक को भूमिका पूरी तरह से साफ़ रखनी चाहिए थी मसलन राम का जीवन काल शिव से कितने साल पहले था, शिव से पहले जो महादेव रूद्र थे वो कौन थे, चंद्रवंशियों का क्या इतिहास था, सती का शिव से करीब सौ साल बड़ा होना कैसे संभव है, सती का पहला पति और उसका इतिहास क्या था, विष्णु कौन थे, नागों का इतिहास और सबसे जरुरी की नीलकंठ का क्या चक्कर है इत्यादि. मुझे लगता है शायद सारे सवालों के जवाब आने वाले अंकों में मिलेंगे. 

इन सबके बावजूद कहानी मनोरंजक है.  हमेशा ये उत्सुकता बनी रहती है की आगे क्या होगा. चूकि शिव भगवान न होकर हमारी तरह इन्सान है इसलिए कहानी तथा घटनाक्रम हमारे जैसी ही लगती है. शिव और सती वाला ट्रैक बोझिल सा लगता है. युद्ध का वर्णन बेहतरीन है.

अंत में यही कहूँगा की अगर आपको पौराणिक कथाओं का ज्यादा ज्ञान नहीं है तो फिर ये उपन्यास आपके लिए बेहतरीन साबित होगा क्योंकि फिर आप इसमें गलतियाँ ढूंढ़ने की कोशिश नहीं करेंगे. अगर आपको पौराणिक कथाओं का ज्ञान है तो कई जगह आपको काफी चीजें अखरेंगी लेकिन कहानी में मजा आएगा. अब चाहे कोई भी परिस्थिति हो, इस उपन्यास को पढ़ा जा सकता है. सर्वविदित कथा में भी मौलिकता ढूंढ़ने के लिए अमीश बधाई के पात्र है. और हाँ मैं इस उपन्यास की दूसरी कड़ी "नागाओं का रहस्य" की भी प्रतीक्षा कर रहा हूँ जिसे पढ़कर मुझे ख़ुशी मिलेगी.

3 comments:

  1. kehen ka matlab yahi hai ye sirf kalpanik kahani hai.
    jisame hindu devtaon ke naam le ke ek kahani bana di gai hai.

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  2. खुदाई से प्राप्त अभिलेखों की भाषा भावचित्रात्मक है। अगर हणप्पा की भाषा का अनुवाद कोई कर सकने में समर्थ हो जाए तो वह वर्तमान भाषा में ही परिलक्षित होगी। ये कहानी काल्पनिक नहीं हो सकती। इसमें कुछ बातें ऐसी हैं जिनकी कल्पना कोई कर ही नहीं सकता।

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