Mar 6, 2012

कभी कभी कुछ अजीब होता है

हमारा जीवन विचित्रताओं से भरा पड़ा है. हम कब क्या चीज सोचते हैं और क्या करते हैं ये पता नहीं चलता. कभी कभी हम कुछ ऐसा करते है या हमारे साथ कुछ ऐसा घटता है जो हमने कभी सोचा नहीं होता और न ही सोच सकते हैं. अपने बारे में बताऊँ तो धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं में मुझे काफी विश्वास है लेकिन जैसे ही बात धार्मिक आडम्बरों की आती है, मुझे उससे नफरत है. आडम्बरों का अर्थ धर्म को तोड़ मरोड़ कर पेश करना है. इसका सामान्य सा उदाहरण आजकल बाबाओं की आई बाढ़ है. कोई भी ऐसा व्यक्ति जो अपने आप को भगवन के समकक्ष रखने की कोशिश करता है, मैं उससे घृणा करता हूँ. यही कारण है की मैं मंदिर तो जा सकता हूँ पर पण्डे पुजारियों से हमेशा दूर ही रहने की सोचता हूँ. और मेरी ये मान्यता असाधारण रूप से दृढ है. पर कल जो हुआ मेरे लिए काफी अजीब था.

कल मेरे घर के बाहर अचानक किसी भिक्षा मांगने वाले ने आवाज लगाईं. आम तौर पर मैं इन सब पर ध्यान ही नहीं देता और कल भी नहीं दिया. वैसे भी मेरा घर तीसरे माले पर है और मैं इन सब के लिए इतनी मशक्कत नहीं कर सकता की ऊपर से नीचे जाऊं और वो भी उन्हें पैसे देने के लिए. मेरी भाभी के बड़े भाई जो कि आये हुए है, वो उन्हें पैसे देने के लिए नीचे गए. जब मुझे पता चला की वो नीचे गए हैं तो मुझे बड़ा अजीब लगा और हँसी भी आई (इन सब चीजों पर मुझे हसीं ही आती है). मैंने बस उन्हें देखने के लिए ऊपर से नीचे झाँका.

वह व्यक्ति जरुरत से ज्यादा ही बुजुर्ग थे. मैं बता नहीं सकता की असल में क्या हुआ पर मैं उन्हें एकटक देखता रहा. बुजुर्गों के लिए मेरे दिल में एक विशेष सम्मान है. कह नहीं सकता शायद मेरे मन में कुछ देर तक द्वन्द चलता रहा शायद बाबाओं के प्रति घृणा और बुजुर्गों के प्रति सामान के बीच में. कुछ समझ नहीं पाया कि किस तरफ जाऊं. कुछ देर उन्हें देखता रहा. जब वे दक्षिणा लेकर चलने लगे तो जैसे मैं नींद से जगा. मैंने ऊपर से पुकार कर उन्हें रुकने के लिए कहा. मैं नीचे गया और उन्हें मैंने १० रूपये दिए. आम तौर पर १० रूपये मेरे लिए कुछ ज्यादा नहीं है पर जब आप एक ऐसे व्यक्ति को देख रहे हों जिसने आजतक किसी बाबाओं को एक फूटी कौड़ी नहीं दी तो शायद ये रकम ज्यादा ही लगेगी.

मुझे वाकई समझ में नहीं आया कि मैंने उन्हें पैसे क्यों दिए. हालाँकि मेरा मन उनके चरण छूने को कर रहा था पर शायद मेरे सहज अभिमान ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया. खैर जब मैं वापस अपने घर पर जाने लगा तो उन्होंने मुझे पीछे से आवाज दी. मैंने पीछे मुड कर पूछा तो उन्होंने कहा कि उनकी मंडली यहीं पास में ठहरी है और उन्हें थोड़े दूध कि आवश्यकता है. मैंने कहा कि अभी तो मेरे घर पर दूध नहीं है तो उन्होंने कहा कि मैं उन्हें दूध खरीद कर दे दूं. आश्चर्य है मैंने उन्हें मना नहीं किया. चूकि मैं उस समय पर्स लेकर नहीं आया था तो मैं वापस घर गया और पैसे लेकर आया. मैंने उनसे पूछा कि उनके लिए कितना दूध पर्याप्त होगा. उन्होंने कहा तीन किलो. एक पल को लगा कि ये कुछ ज्यादा तो नहीं मांग रहा. पर फिर भी मैं उन्हें लेकर बगल के दुकान पर गया. संयोग से उसके पास केवल दो किलो दूध था. मैंने बाबा से पूछा कि क्या दो किलो दूध पर्याप्त होगा. उन्होंने कहा हाँ ठीक है. अंततः मैंने उन्हें दो किलो दूध खरीद कर दिया. वहां उपस्थित सारे लोग मुझे वैसे ही नजरों से देख रहे थे जैसा कि संभवतः मैं किसी को इस परिस्थिति में देखता (परिहास कि दृष्टि से), इसलिए मैंने उन्हें नमस्कार किया और जल्दी से वहां से चला गया.

घर वापस पहुँच कर देखा तो मेरे परिवार वाले खुद आश्चर्यचकित थे. मैं खुद हैरान था कि आखिर हो क्या गया है? अभी तक नहीं समझ  पाया कि अचानक मैंने ये सब क्यों किया और उस समय मेरा अभिमान कहाँ चला गया? फिर मैं सोचता हूँ कि शायद इसे ही चमत्कार कहते है. खैर जो भी था मेरे लिए एक अजीब और संतुष्टि से भरा अनुभव था. 

और हाँ, अब ये मत समझ लीजियेगा कि बाबाओं के प्रति मेरी मानसिकता बदल गयी है. मैं अब भी उन्हें देखना पसंद नहीं करता और उन्हें बर्दाश्त नहीं कर सकता. और मुझे नहीं लगता कि कोई चमत्कार मेरी इस मानसिकता को बदल देगा. आखिर चमत्कारों की भी कोई सीमा होती है.