Jul 24, 2012

कुरुक्षेत्र की भूमि पर

गत २१ जुलाई को मेरा जन्मदिन था. कई दिनों बल्कि कई महीनों से मैं कुरुक्षेत्र जाने की सोच रहा था ताकि वहाँ जाकर महाभारत के कुछ अवयवों का साक्षी बन सकूँ. कई बार वहाँ जाने की पूरी योजना भी बन गयी थी किन्तु किसी न किसी कारण जाना नहीं हो सका. लगता है जैसे अपने जन्मदिन के दिन हीं जाना लिखा था. चुकी इस २१ जुलाई शनिवार का दिन था और छुट्टी भी थी इसलिए मैंने कुरुक्षेत्र जाने का निश्चय किया. मैंने अपने मित्र प्रशांत साहू से संपर्क किया जो मेरे मेरे साथ एच सी एल में काम करता था और कई वर्षों तक कुरुक्षेत्र में हीं कार्यरत था. भाग्य से उसके पास भी समय था और वो मेरे साथ वहाँ चलने को तैयार हो गया.

एक दिन पहले २० जुलाई को मैं रोहतक के लिए रवाना हुआ जहाँ मैं पहले कभी कार्यरत था और प्रशांत भी अभी वहीँ काम कर रहा है. हालाँकि काफी रात में वहाँ पहुंचा और रोहतक में ज्यादा देर ठहर नहीं सका फिर भी इतने सालों के बाद दोबारा रोहतक जाना अपने आप में एक सुखद अनुभव था. अगले दिन मैं और प्रशांत तडके हीं कुरुक्षेत्र की ओर निकले. लगभग चार घंटे बस में सफर करने के बाद हम कुरुक्षेत्र पहुचे. वहाँ पहुंच कर घूमने के लिए साधन की समस्या थी पर प्रशांत के एक मित्र ने हमारे लिए बाइक की व्यवस्था कर दी और हमने अपनी यात्रा शुरू की.

सबसे पहले हम ज्योतिसर गए. कहा जाता है कि यहीं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था. वहाँ एक बरगद का पेड़ है और उसके बारे में किवदंती है कि ये पेड़ उस गीता उपदेश का साक्षी है. हालाँकि आज के वैज्ञानिक युग में ये मानना संभव नहीं है कि कोई पेड़ पांच हजार वर्षों तक जीवित रह सकता है. वहाँ का वातावरण काफी शांत था और एक आश्चर्जनक बात थी कि बाहर का वातावरण जबरदस्त गर्म होने के बावजूद वहाँ का परिसर काफी ठंडा था. वहाँ एक अजीब सी गुरु शिष्य परंपरा देखने को मिली. हमने देखा कि एक विदेशी व्यक्ति एक भारतीय बालक को संस्कृत के श्लोक सुना रहा था. ये अपने आप में एक विचित्र अनुभव था. 

वहाँ से हम लोग कुछ हीं दूर स्थित नरकातारी पहुंचे. ये वही जगह है जहाँ पितामह भीष्म अर्जुन के बाणों की शय्या पर लेटे थे. वहाँ पितामह भीष्म का एक मंदिर बना हुआ था और इससे पहले मैंने कहीं और उनका मंदिर नहीं देखा. वहाँ काफी देर बैठा रहा और गहन शांति का अनुभव किया. अगर सच कहूँ तो मैं कुरुक्षेत्र केवल इसी जगह को देखने के लिए आना चाहता था क्योंकि इससे अधिक उत्कंठा मेरी और किसी स्थान को देखने की नहीं थी. इस जगह पर आना मेरा सपना था और वो सपना उस दिन पूरा हुआ. 

वहाँ से चल कर हम कुरुक्षेत्र के विज्ञानं भवन पहुंचे और वहाँ उपलब्ध वैज्ञानिक यंत्रों का भरपूर मजा लिया. उसी भवन के उपरी तल में महाभारत के युद्ध का जीवंत दृश्य बनाया हुआ था. चित्रकारी इतनी बढ़िया थी कि लगा जैसे मैं महाभारत के युद्ध के बीच में हीं आ गया हूँ. मेरे विचार में जो भी व्यक्ति वहाँ जाता है, उसे एक बार ये स्थान जरुर देखना चाहिए. विज्ञानं भवन से सटा हुआ हीं कुरुक्षेत्र संग्रहालय था. कई देखने लायक वस्तुएँ उसमे थी और अधिकतर चीजें महाभारत से जुडी हुई थी. वहाँ महाभारत भवन देखने का अवसर मिला जो कुछ हीं महीने पहले दर्शकों के लिए खोला गया है. अद्भुत, चमत्कृत कर देने वाली कलाकारी और चित्रकारी देखने को मिली. मैंने उससे अच्छी चित्रकारी और मूर्तिकला का उससे अच्छा नमूना और कहीं नहीं देखा था. बेहतरीन और हमेशा स्मरणीय अनुभव था.

वहाँ से चल कर हम ब्रह्म सरोवर पहुंचे. स्थान बड़ा मनोरम था. शाम होने को आई थी और गर्मी बड़ी तेज थी. मैं वहाँ नहाने से अपने आप को रोक नहीं पाया. प्रशांत तो खैर मना नहीं पर मैं वहाँ जी भर कर नहाया. उसके बाद हम ज्यादा देर वहाँ नहीं रुके. शाम होते होते प्रशांत रोहतक और मैं दिल्ली की ओर निकल पड़ा. दिन भर चलने और इतनी यात्रा के कारण थका हुआ था पर मन में एक संतोष था कि आखिरकार मैं कुरुक्षेत्र घूम हीं आया. चाहता तो था कि उसी दिन इस पोस्ट को लिखूं पर थकावट की वजह से लिख नहीं पाया. खैर तब नहीं तो अब सही. और हाँ, वहाँ जाना बड़ा शुभ रहा. क्यों? ये बता नहीं सकता, व्यक्तिगत है. देखते हैं फिर कब जाना होता है.