Aug 16, 2012

स्वयंवर - अध्याय दो

अगले दिन काशी राजसभा में स्वयंवर पर चर्चा होती है. सारे सभासद स्वयंवर के विरोध में हैं किन्तु महाराज फिर भी स्वयंवर के आयोजन की बात करते हैं. सारे लोग, यहाँ तक कि कुलगुरु भी उन्हें समझाते हैं कि महाजनपदों खासकर कुरु और मगध को रुष्ट करना उचित नहीं है किन्तु फिर भी काशी नरेश स्वयंवर करवाने का निर्णय ले हीं लेते हैं. उनके जिद के आगे सभी लोगों को विवश होना पड़ता है. अंततः ये निर्णय लिया जाता है कि स्वयंवर के लिए सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएँ. इसके आगे क्या होगा, ये हम अगले अध्याय में देखेंगे.

“अगर हमने हस्तिनापुर को अनदेखा किया तो भीष्म हमपर आक्रमण कर सकते हैं और उस स्थिति में काशी की पराजय निश्चित है. अगर ये मान भी लिया जाए कि भीष्म ज्ञानी हैं और हमारी परिस्थिति समझ लेंगे किन्तु जरासंध अत्यंत मानी और घमंडी है. वह रुष्ट होकर हमपर आक्रमण कर सकता है और हम जानते हैं कि हमारी सैन्य शक्ति मगध के आगे नगण्य है. भीष्म के अतिरिक्त किसी में इतना बल नहीं है जो जरासंध से सीधी टक्कर ले सके और जहाँ तक मैं समझता हूँ, भीष्म इस सम्बन्ध में तटस्थ ही रहेंगे.”

... इसी अध्याय से ...