Aug 17, 2012

स्वयंवर - अध्याय तीन

काशी नरेश की आज्ञा के अनुसार आमात्य स्वयंवर की औपचारिकताओं को पूरा करने में लगे हैं कि अचानक उन्हें महाराज का बुलावा आता है. वहाँ पहुँचने पर उन्हें महाराज की ओर से ऐसी आज्ञा मिलती है जिससे वो सन्न रह जाते हैं. वे महाराज को समझाते हैं कि ऐसा करना काशी के हित में नहीं होगा किन्तु महाराज उन्हें केवल अपनी आज्ञा पूरी करने का आदेश देते हैं. आमात्य चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते. आगे की कहानी अगले अध्याय में.

“और इस बात का ध्यान रहे...” इन्द्रधुम्न ने जैसे आमात्य की बार सुनी हीं नहीं “...कि बांकी दूतों और किसी भी अन्य व्यक्ति को इस बारे में ज्ञात न हो.” वे आमात्य के पास आए और उनकी आँखों में देखते हुए कहा "किसी को नहीं अर्थात किसी को भी नहीं. यहाँ तक कि कुलगुरु और प्रधान सेनापति को भी नहीं. उचित समय आने पर मैं स्वयं उन्हें बताऊंगा.”

... इसी अध्याय से ...