Aug 18, 2012

स्वयंवर - अध्याय चार

एक महीने के बाद काशी में उत्सव का माहौल है क्योंकि सारे महाजनपदों ने स्वयंवर के लिए अपनी सम्मति दे दी. सब प्रसन्न है लेकिन उसी समय आमात्य महाराज का वो आदेश सुनाते हैं जो उन्होंने उन्हें दी थी. सारी सभा आश्चर्य चकित रह जाती है. सभी लोग खासकर कुलगुरु महाराज को उनकी गलती का बोध करते हैं. आखिर में काशी नरेश को भी लगता है कि उनसे एक बड़ी गलती हो गयी है और उस गलती को सुधरने के लिए वो आमात्य को हस्तिनापुर जाने का आदेश देते हैं. हस्तिनापुर में क्या होता है? ये हम अगले अध्याय में देखेंगे.

“इन्द्रधुम्न थोड़ी देर सोचते रहे. उन्हें कदाचित यह एहसास होने लगा था कि जिसे वो सामान्य अनदेखी समझ रहे थे, वह कुछ ज्यादा ही गंभीर निकला. वाकई अगर भीष्म ने अगर काशी पर आक्रमण कर दिया या फिर स्वयंवर में बाधा पहुँचाने की कोशिश की तो वे क्या करेंगे? पूरे आर्यावर्त में ऐसा कौन है जो भीष्म का सामना करने का साहस रखता हो? न केवल हस्तिनापुर की सेना अथाह है बल्कि भीष्म स्वयं एक प्रचंड योद्धा हैं.”

... इसी अध्याय से ...