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Monday, September 24, 2012

स्वयंवर - अध्याय बीस

अगले दिन भीष्म अम्बा की समस्या पर राजसभा में चर्चा करते हैं. वहाँ उनके सामने आश्चर्यजनक परिस्थितियां आती हैं. उसपर से अचानक अम्बा राजसभा में एक प्रस्ताव रखती है जिससे सभी लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं. भीष्म सभा विसर्जित कर देते हैं और वहाँ से चले जाते हैं. बाद में अम्बा उनसे मिलने आती है और पिछली परिस्थितियों के बारे में एक और जबरदस्त रहस्योदघाटन होता है. अब आश्चर्यचकित होने की बारी अम्बा की होती है. उसे अब समझ में आता है कि भीष्म को सारी चीजों का पहले से ज्ञान था. ऐसी क्या बात थी जो भीष्म को पहले से पता थी? ये हम अगले अध्याय में देखेंगे. 

“तो फिर ठीक है...” अम्बा ने ऊँचे स्वर में कहना प्रारंभ किया “...मैं, काशी नरेश इन्द्रधुम्न की ज्येष्ठ पुत्री अम्बा आज इस पवित्र गंगातट पर ये प्रतिज्ञा करती हूँ कि जब तक आपका सर्वनाश नहीं कर दूंगी तब तक शांत नहीं बैठूंगी. पल प्रतिपल मैं इसी अपमान की ज्वाला में जलती रहूंगी और यही मुझे याद दिलाता रहेगा कि वो भीष्म, जिसे संसार अजेय समझता है, उसका सर्वनाश होना बांकी है.” 

... इसी अध्याय से ...

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