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Thursday, September 27, 2012

स्वयंवर - अध्याय इक्कीस

पहली बार इस कथा में परशुराम का आगमन होता है. उनका इस प्रकार अचानक आना भीष्म के लिए भी आश्चर्य का विषय होता है. धीरे धीरे भीष्म को पता चलता है कि वास्तव में परशुराम के आने का कारण क्या है. परशुराम भीष्म को किसी चीज की आज्ञा देते हैं जो भीष्म स्वीकार नहीं करते. इससे क्रोधित होकर परशुराम भीष्म को युद्ध के लिए चुनौती देते हैं. भीष्म अपने गुरु के साथ इस युद्ध को टालने का हर संभव प्रयास करते हैं पर वे सफल नहीं होते. बाद में इसमें अम्बा की भी वापसी होती है और भीष्म को ये पता चलता है कि उनके और परशुराम के युद्ध की धुरी दरअसल अम्बा हीं है. अम्बा का इस युद्ध से क्या लेना देना है? ये हम अंतिम अध्याय में जानेंगे. 

“इतना सरल नहीं है भीष्म. तुम इतनी सरलता से मृत्यु को गले नहीं लगा सकते. कुछ और नहीं तो कम से कम अपने क्षत्रिय होने की लाज तो रखो. मैं भी तो देखूं कि मैंने अपने शिष्य को क्या सिखाया है? सर्वनाश तो तुम्हारा होगा भीष्म और वो भी हस्तिनापुर की प्रजा के सामने हीं होगा ताकि संसार ये देख ले कि जब जब क्षत्रिय समाज अन्याय के पथ पर चलेगा, उसका परिणाम भी भयानक होगा.” 

... इसी अध्याय से ...

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