Sep 5, 2012

गाँव की शांति में

मैं भागलपुर शहर का रहने वाला हूँ. काफी सालों पहले मेरे दादाजी ने मुझे बताया था कि हमारा असली गाँव भरतखण्ड है. मैंने और दादाजी ने कई बार वहाँ जाने की योजना बनाई पर दुर्भाग्य से जा नहीं सके. अब दादाजी नहीं रहे किन्तु अपने गाँव को देखने की उत्कंठा मेरे मन में हीं रह गयी. हमेशा से दिल में चाह थी कि कभी गाँव जाऊ और वहाँ की जिंदगी जियूं. कुछ दिन पहले एक ऐसा हीं मौका मिला.

मेरे सहकर्मी हरेन्द्र ने मुझे अपने साथ अपने गाँव चलने का निमंत्रण दिया. मेरा पहला सवाल यही था कि "गाँव हैं न?". उसने कहा "हाँ सर, गाँव हीं है". फिर क्या था मैं चलने को तैयार हो गया. पिछले शनिवार १ सितम्बर को सुबह सात बजे हम अलीगढ की ओर अपनी बाइक पर निकले. जल्द हीं पता चल गया कि बाइक से आकर हमने गलती कर दी है क्योंकि सफर लगभग २०० किलोमीटर लंबा था. उसपर समस्या ये थी कि उससे पहली रात को मैं ठीक से सो नहीं पाया था. खैर सफर का मजा लेते हुए और मार्ग में पड़ते गाँवों का दृश्य देखते हुए हम अलीगढ की ओर बढते रहे. हरेन्द्र के लिए शायद ये आम बात थी किन्तु मेरे लिए इतने सारे गाँवों से होकर गुजरना एक सुखद अनुभव था. 

लगभग पांच घंटे की यात्रा के बाद हम हरेन्द्र के गाँव चंडोला सुजानपुर पहुंचे. ये उत्तर प्रदेश के अलीगढ का एक छोटा सा गाँव है. मैं एक बात बताना चाहता हूँ कि मेरे मन में गाँव की एक छवि बनी हुई थी और चंडोला सुजानपुर बिलकुल वैसा हीं गाँव था. जैसे हीं मैं हरेन्द्र के साथ उसके घर में घुसा, मुझे समझ में आ गया कि मैं सही जगह आ गया हूँ. वहाँ उसके पूरे परिवार से मिला और दो दिनों में मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी दूसरे के घर में हूँ. अच्छी बात ये भी थी कि केवल एक दिन पहले वहाँ रामायण की कथा खत्म हुई थी और इसी लिए माहौल थोडा अध्यात्मिक था जो बिलकुल मेरे अनुकूल था. हरेन्द्र का घर काफी रमणीय था. ऐसा लगता था जैसे किसी वन्य प्रदेश के बीच एक सुन्दर सा घर हो. मुझे मेरे बचपन की याद आ गयी क्योंकि उस समय मेरा घर भी कुछ वैसा हीं था और इसी लिए मैंने वहाँ बहुत अच्छा महसूस किया.

वहाँ पास के गाँव के हीं एक बुजुर्ग मौजूद थे जिन्होंने रामायण की कथा कराई थी. उनका साथ मुझे बहुत अच्छा लगा और मैं उन्हें दादाजी हीं कहने लगा. धार्मिक विषयों पर उनकी राय काफी हद तक मुझसे मिलती थी. दो दिनों में मैंने सबसे अधिक बात उन्ही से की और कई धार्मिक विषयों पर मेरी उनसे गहन चर्चा हुई जिससे मुझे काफी संतुष्टि भी मिली और मेरा काफी ज्ञान भी बढ़ा. सबसे लाभ की बात जो वहाँ मेरे लिए रही वो बेहतरीन खाना था. पिछले कुछ महीनों से अकेले हूँ और कभी ढंग का खाना नहीं मिलता. ऐसे में तो घर का खाना मेरे लिए दुर्लभ वस्तु हीं थी हालाँकि घर के खाने के चक्कर में मैंने दोनो दिन कुछ अधिक हीं खा लिया.

अगले दिन मैं और हरेन्द्र उन्हें छोड़ने उनके गाँव गए. बीच में हम एक और संत से मिलने गए. वहाँ जाने का रास्ता बड़ा हीं उबड खाबड़ था. वो एक छोटी सी पगडण्डी थी जो बारिश की वजह से और खराब हो गयी थी पर वही तो गाँव की असली पहचान थी. जब हम दूसरे सज्जन के घर पहुंचे तो वहाँ का माहौल देख कर मेरा मन प्रसन्न हो गया. वो एक छोटा सा घर था और मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी जंगल के बीच में बने एक सुन्दर से घर में पहुँच गया हूँ. बहुत हीं थोड़े समय में मुझे उस जगह से लगाव हो गया. अगर अलीगढ दुबारा जाना हुआ तो उस जगह फिर से जाना चाहूँगा. थोड़ी देर वहाँ रुकने के बाद के बाद हम वहाँ से थोड़ी दूर दादाजी के गाँव पहुंचे. वहाँ दादाजी की कुटिया में जाने का अवसर मिला. उनका अत्यंत साधारण और सादा रहन सहन देख कर मन प्रसन्न हो गया. थोड़े में हीं संतुष्ट रहने का आनंद हीं कुछ और होता है. वापस आते हुए उनकी सहधर्मिणी से मिलने और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर मिला.

उसी दिन दोपहर को हम वापस दिल्ली के लिए निकल पड़े. अलीगढ आते हुए हम बुलंद शहर होते हुए आये थे लेकिन वापसी में हमने दूसरा रास्ता पकड़ा जो बहुत हीं शांत और सुन्दर था. पहली बार यमुना एक्सप्रेस वे पर जाने का मौका मिला और हम तूफानी रफ़्तार से दिल्ली की ओर वापस आये. हालाँकि ये रफ़्तार कुछ मंहगी पड़ी क्योंकि मेरी बाइक का बैंड बज गया फिर भी इतनी तेज रफ़्तार (१०० किमी प्रति घंटा से ऊपर) बाइक चलाने का अवसर बार बार नहीं मिलता. जब वापस पहुंचे तो मैं तो थक कर चूर हो चुका था और नींद भी बड़ी अच्छी आई. सोचता हूँ अगर हरेन्द्र मुझे अपने घर नहीं ले गया होता तो इतना आत्मीय और शांत अनुभव प्राप्त करने की जगह शायद मैं घर पर सो कर पूरा दिन बिताता. एक बात की कमी रह गयी कि मैं वहाँ की कोई तस्वीर नहीं ले पाया. जो भी हो, ये दो दिन मेरे जीवन के सबसे यादगार दिनों में से एक थे.