Pages

Tuesday, February 18, 2014

विश्व पुस्तक मेले में "स्वयंवर"

विश्व पुस्तक मेले में "स्वयंवर"
जब मैं "स्वयंवर" लिख रहा था तो कभी सोचा नहीं था की कुछ पल ऐसे भी आयेंगे जो अविस्मर्णीय होंगे. मैंने कभी स्वयंवर के लिए कोई मापदण्ड तय नहीं किया था और ना हीं इसके कोई लम्बी चौड़ी अपेक्षा हीं रखी थी. हाँ मैं कुछ ऐसा जरुर चाहता था जो मुझे कुछ ख़ुशी दे सके. कमाल की बात ये है कि ऐसी कई चीजें हुई जिसने मुझे ग़जब का आत्मविश्वास दिया. पिछले कुछ दिनों में मैं अपने पुस्तक के सिलसिले में कुछ ऐसे लोगों से मिला जिनसे मिलना मेरा स्वप्न था. किन्तु आज यहाँ पर मैं उन सभी चीजों के बारे में नहीं लिखने वाला हूँ पर हाँ, मैं उन सभी घटनाओं के बारे में लिखे बिना रह भी नहीं सकता. आने वाले कुछ समय में उनके बारे में अवश्य लिखूंगा.

फिलहाल उस एक क्षण के बारे में बता दूँ जो मेरे लिए विशिष्ट थे. पिछले हफ्ते (१६ जनवरी २०१४) मेरा परममित्र प्रकाश मुझसे मिलने आया. उसके बारे में बस ये बताना उचित होगा कि वो स्वयं हिंदी का परमप्रेमी और ज्ञाता है और उसे ये ज्ञान उसके परिवार से विरासत में मिला है. उसने अचानक मुझसे "विश्व पुस्तक मेले" में चलने को कहा. सच कहूँ मेरी बिलकुल भी इच्छा नहीं थी पर उसकी जिद के आगे मेरी एक भी नहीं चली. बाद में पता चला कि उसकी ये जिद मुझे कितनी ख़ुशी देने वाली थी.

दिल्ली में पिछले हफ्ते विश्व पुस्तक मेले का आयोजन हुआ जो अगले हफ्ते तक चलने वाला है. बड़ी विडंबना है कि आज से पहले मैं कभी किसी पुस्तक मेले में नहीं गया खासकर इस प्रकार के विश्वस्तरीय आयोजन में. ओह! क्या माहौल था. वहां उमड़ी भीड़ को देखकर बड़ा संतोष हुआ कि भारत में अभी तक पुस्तक प्रेमियों की बहुयात है. हम दोनों ने वहां के एक एक पल को सहेजा या यूँ कहूँ कि एक एक पल को जिया. हम दोनों बड़े पशोपेश में थे कि कौन सी पुस्तक खरीदें कौन सी नहीं. समय का आभाव तो था हीं, पैसों का कुछ ज्यादा हीं आभाव था पर भी हम दोनों ने कुछ पुस्तकें खरीदी.

विश्व पुस्तक मेले में "स्वयंवर"
फिर हमलोग डायमंड बुक्स के स्टाल पर पहुंचे और हमारी नजर सामने शेल्फ पर पड़ी जहाँ हमें स्वयंवर के दर्शन हुए. उस समय की मनोदशा का वर्णन करना बड़ा मुश्किल है. लगा जैसे इस पुस्तक को लिखने का श्रम सार्थक हो गया. मुझे नहीं पता कि पाठकों को स्वयंवर के बारे में पता भी है या नहीं, खरीद रहा है भी या नहीं पर मेरे लिए विश्व पुस्तक मेले जैसे मंच पर उसकी उपस्थिति हीं पर्याप्त है. बड़ा हीं सुखद अनुभव था. 

उस दिन मन ऐसा रमा कि अगले दिन हम फिर वहां पहुँच गए और उस दिन तो कमाल हो गया. अभी नहीं पर जल्द हीं उसके बारे में बात करूँगा. अंत में उसका धन्यवाद् जरुर करूँगा जिसकी वजह से ये संभव हुआ. अपनी पुस्तक के लिए शायद मैं उतना उत्साहित नहीं था जितना वो था. प्रकाश, बहुत धन्यवाद्.

2 comments:

  1. I understand how precious this moment could be for an author! You expressed your feelings beautifully! Proud of you and happy for you...:)

    ReplyDelete
    Replies
    1. Thanks Didi.. You can only understand what was my feeling.. :)

      Delete