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Tuesday, May 27, 2014

आखिर हिंदी साहित्य का भविष्य कहाँ जा रहा है?

आपने विद्यालय के दिनों को याद करता हूँ तो चेहरे पे अनायास हीं एक मुस्कान आ जाती है. जब हम नयी कक्षा में जाते थे तो नयी पुस्तकों के प्रति जबरदस्त उत्कंठा रहती थी. मुझे याद है कि जैसे हीं नयी कक्षा की पुस्तकें आती थी तो सबसे पहला काम होता था हिंदी की पुस्तक को पृष्ठ दर पृष्ठ ख़त्म करना. आप लोगों को भी शायद वो दौर याद होगा जब हमारी हिंदी की पुस्तकों में एक से बढ़कर एक रचनाकारों की कहानियां और कवितायेँ हुआ करती थी. आज अगर प्रेमचंद, शरतचंद्र, जयशंकर प्रसाद, फणीश्वर नाथ रेणु, महादेवी वर्मा, रविन्द्रनाथ ठाकुर, अज्ञेय, निराला और भी ना जाने कितने कालजयी साहित्यकार जन जन के चहेते हैं तो इसका एक बड़ा कारण वे पुस्तकें भी हैं जो हमने अपने बचपन के दिनों में पढ़ी थी.

उन दिनों जब हम पुस्तकालय में जाते थे तो चारो ओर सजी हिंदी पुस्तकों को देख कर मन प्रसन्न हो जाता था. अंग्रेजी साहित्य में हमें ना ज्यादा रूचि थी और ना हीं ज्यादा ज्ञान. अंग्रेजी स्कूल काफी कम हुआ करते थे किन्तु अगर आप उन विद्यालयों के पुस्तकालयों में भी अगर जाते तो वहाँ भी आपको हिंदी पुस्तकों की प्रचुरता हीं मिलती थी. उन दिनों अंग्रेजी पुस्तकों का मतलब हुआ करता था अंग्रेजी व्याकरण की पुस्तकें अथवा पाश्चात्य साहित्यकारों की प्रसिध्द कृतियाँ. हालाँकि उनके भी हिंदी अनुवाद हीं अधिक प्रचलित थे. उन दिनों अगर कोई व्यक्ति अंग्रेजी साहित्य पढता हुआ दिख जाता था तो उसके केवल दो हीं निष्कर्ष निकलते थे: एक, वो व्यक्ति बहुत हीं अधिक शिक्षित है और दूसरा, वो पुस्तक किसी महान पाश्चात्य रचनाकार की कृति है. कुल मिलाकर कहा जाए तो उस समय पुस्तक का मतलब होता था "हिंदी पुस्तक". 

आज जब ये सब सोचता हूँ तो लगता है जैसे समय का चक्र पूरा उल्टा घूम चुका है. हिंदी पुस्तके? वो होती हैं क्या? हिंदी माध्यम के विद्यालय? अभी भी चल रहे हैं क्या? ऊपर उल्लेखित लेखक? कौन हैं वे? मजेदार बात ये हैं कि शायद आपको आज कई अंग्रेजी स्कूल में प्रेमचंद की कहानियां मिल जाएंगी किन्तु छात्र ये नहीं जानते कि प्रेमचंद दरअसल थे कौन और हिंदी साहित्य में उनका क्या योगदान है? उनके लिए प्रेमचंद की कहानी सिर्फ एक कहानी है. उनकी दृष्टि में प्रेमचंद और शेक्सपियर में कोई अंतर नहीं है. पाश्चात्य संस्कृति में रंगे कुछ छात्र इस बात से रुष्ट हैं कि जिस पुस्तक में शेक्सपियर, जॉर्ज बनार्ड शॉ और रस्किन बांड जैसे साहित्यकारों की कृतियाँ है वहाँ प्रेमचंद कहाँ से आ गए? मैं इस विषय को ज्यादा नहीं खीचना चाहता किन्तु कुछ चीजें तो हैं जो आप भी अपने प्रतिदिन के जीवन में देखते होंगे. 

आज अगर कोई व्यक्ति हिंदी की पस्तक पढता दिख जाए तो उसका भी दो मतलब निकलता है: पहला, ये व्यक्ति अंग्रेजी भाषा नहीं जानता और दूसरा, ये काफी पुराने विचारों का व्यक्ति है मतलब हम लोगों की तरह आज के नए ज़माने का नहीं है. मैं प्रतिदिन मेट्रो में सफ़र करता हूँ और वहाँ आपको कई लोग मिल जाएँगे जो अपने समय का सदुपयोग पुस्तक पढ़कर करते हैं किन्तु हिंदी पुस्तक पढता हुआ आपको कोई विरला हीं मिलेगा. ऑनलाइन जाइए, पुस्तकों को सर्च कीजिये, १००० अंग्रेजी पुस्तकों पर आपको एक हिंदी की पुस्तक मिलेंगी. कानौट प्लेस जाइए, हर २०० मीटर पर आपको पुस्तक बेचने वाले मिल जाएँगे पर एक भी हिंदी पुस्तक आपको नहीं मिलेगी. स्टेशन चले जाइये, हर कदम पर पुस्तक की दुकान दिख जाएगी किन्तु हिंदी पुस्तकों का अनुपात नगण्य होगा. किसी भी पुस्तकालय में चले जाएँ, अब वहाँ आपको हिंदी पुस्तकों का एक छोटा सा कोना नजर आएगा जो अंग्रेजी पुस्तकों की भीड़ में जैसे कोई हुई सी नजर आती है. नए ज़माने के ऐसे २० साहित्यकार का नाम आपको मालूम होगा जो अंग्रेजी में लिखते हैं पर दिमाग पर पर्याप्त मात्र में जोर देने पर भी २ ऐसे व्यक्ति का नाम आपको नहीं याद आएगा जो हिंदी में लिखते हैं. आज हर दिन अंग्रेजी भाषा का एक प्रतिभाशाली और प्रसिध्द लेखक जन्म लेता है किन्तु हिंदी का आखिरी प्रसिध्द लेखक कौन था, ये सोचने में आपको काफी समय लगेगा. बाज़ार में अंग्रेजी के बेस्ट सेलर्स की बाढ़ सी आई हुई है लेकिन एक भी हिंदी पुस्तक आपको नहीं मिलेगी जिसे पर्याप्त पाठक भी मिल सके. नए लेखकों को तो छोड़ दें, हिंदी साहित्य की स्थिति इतनी भयावह है कि प्रसिध्द और स्थापित हिंदी लेखकों ने भी जैसे लिखना छोड़ दिया है. नरेन्द्र कोहली और अशोक चक्रधर जैसे लेखकों ने लम्बे समय से कुछ नया नहीं लिखा है. 

दुःख होता है किन्तु कारण समझ से परे है. सीधा साधा जवाब ये है कि जब हिंदी के पाठक हीं नहीं हैं तो हिंदी की पुस्तकें और लेखक कहाँ से आयेंगे किन्तु ये परिस्थितियां कब, कैसे और क्यों उत्पन्न हुई, कोई बता नहीं सकता. 

कुछ दिनों पहले मैंने एक हिंदी उपन्यास "स्वयंवर" लिखा था. उसका क्या हश्र हुआ होगा ये बताने की जरुरत नहीं है. जब मैं प्रकाशक के साथ अनुबंध कर रहा था तो ऐसा लग हीं नहीं रहा था जैसे उन्हें कोई भी उत्साह हो. उनकी मनोदशा ऐसी थी जैसे वे बेमन से कुछ कर रहे हों और ये स्थिति तब थी जब प्रकाशक को पुस्तक के लिए सारा खर्चा मैंने अपनी जेब से दिया था. मैं खुश था कि भारत के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक मेरी पुस्तक को छापने के लिए तैयार हो गयी है लेकिन जब पुस्तक बाज़ार में आई तो प्रचार के नाम पर प्रकाशक का प्रयास शून्य था. किसी भी तरह से उन्होंने मेरी पुस्तक को प्रचारित करने की आवश्यकता नहीं समझी. मैं कितना निराश हुआ ये मैं बता नहीं सकता. जहाँ वे अंग्रेजी के सामान्य पुस्तकों को भी जोर शोर से प्रचारित कर रहे थे वही मेरा उपन्यास उपेक्षित पड़ा रहा. किस लिए? क्योंकि वो हिंदी में था. काश वे मेरी पुस्तक के लिए कुछ तो करते. केवल एक प्रयास! वो भी मेरे लिए पर्याप्त था. कुछ दिनों पहले जब मैंने अपनी पुस्तक की प्रतिक्रिया के बारे में प्रकाशक से पूछा तो उन्होंने बड़े दुखी मन से मेरी पुस्तक की असफलता के बारे में मुझे बताया. शायद उन्हें मेरी पुस्तक को लेकर अपने फैसले पर अफ़सोस था. फिर से बता दूं कि ये तब था जब प्रकाशक के जेब से एक फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं हुई. मेरी जेब से केवल पैसा हीं नहीं गया बल्कि मेरी पूरी मेहनत व्यर्थ चली गयी. संतोष की बात ये रही कि जिन लोगों ने मेरी पुस्तक पढ़ी, उन्होंने बेहतरीन प्रतिक्रिया दी और पाठकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया से अधिक महत्वपूर्ण मेरे लिए और कुछ नहीं है चाहे वो केवल एक हीं पाठक हो. 

कुछ लोगों ने मुझे कहा कि मैंने हिंदी में पुस्तक लिख कर गलती कर दी. अगर मैंने यही पुस्तक अंग्रेजी में लिखी होती तो मुझे जबरदस्त प्रतिक्रिया मिलती. कुछ लोगों ने मुझे अपने उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद करवाने का भी सुझाव दिया. सुनकर दुःख भी हुआ और हंसी भी आयी. जिस पुस्तक की पूरी पृष्ठभूमि हीं हिंदी हो उसे अंग्रेजी में कैसे लिखा जाये. जरा सोच कर देखिये कि अगर प्रेमचंद केवल प्रसिद्धी पाने के लिए अंग्रेजी भाषा में लिखते तो क्या वे कलम के सिपाही कहलाते? क्या केवल प्रसिद्धी पाने के लिए किसी पुस्तक की आत्मा को मार देना उचित है? 

क्या मैं आगे कोई पुस्तक लिखूंगा? अवश्य.

क्या मैं अपनी इस गलती से सबक लेते हुए उसे अंग्रेजी में लिखूंगा? बिलकुल नहीं क्योंकि मेरे लिए ये कोई गलती नहीं है जिससे मैं सबक ले सकूँ. अगर पाठक पुस्तक की श्रेष्ठता का पैमाना भाषा को मानते हैं तो यही सही. ये मेरी ओर से भी लागू होता है. मेरी पुस्तक की आत्मा हिंदी है और सिर्फ कुछ लाभ के लिए मैं पाठकों के सामने मृत रचना नहीं रख सकता. 

मैं बस उन नवोदित एवं स्थापित लेखकों का आव्हान करना चाहता हूँ जो हिंदी भाषा में लिखने के लिए कटिबद्ध हैं. घबराएँ नहीं, चाहे हिंदी पढने वाले मुट्ठी बार लोग हीं क्यों न हों, पर उनके सामने सजीव और श्रेष्ठ रचना रखना हमारी जिम्मेदारी है. पुस्तकों का चाहे कितना भी व्यापारीकरण हो जाये किन्तु हिंदी के यथार्थ पाठकों का एक समूह है और हमेशा रहेगा. हमें बस उस समूह को विस्तारित करना है और हमेशा ऐसी कृतियों को सामने लाना है जो हिंदी साहित्य में एक मिसाल हो. आज जो प्रकाशक हिंदी साहित्य से नजरें चुराते फिर रहे हैं उन्हें वो दिन भी देखना पड़ेगा जब पाठक अपनी मातृभाषा की ओर फिर से मुड़ेंगे और उस समय अंग्रेजी उनकी सहायता नहीं कर पायेगी और वे हमारी ओर ललचाई दृष्टी से देखेंगे.

मित्रो, हिंदी की वर्त्तमान परिस्थितियां अत्यंत चिंतित करने वाली हैं. आवश्यकता इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा लोग आगे आयें और हिंदी को बढ़ावा दें. ना केवल रचनाकार बनकर बल्कि एक शुध्द पाठक बनकर और उनकी कृतियों को प्रोत्साहित कर के भी, अन्यथा कहीं ऐसा ना हो कि हिंदी साहित्य केवल एक इतिहास बन कर रह जाए.

4 comments:

  1. Bahut hi sunder lekh h aur mai apke is lekh ka poora samrthan krte huye jyada se jyada logo tk pahunchane ka pryas karunga .......... Aur apne kabhi fb pe swymver k bare me charcha kuch kam ki hai ..... Aisa mujhe lagta h

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    1. Anand Ji,

      Aapke is tippani ke liye dhanyawad. Apni or se mere upanyas ke promotion ka maine pura prayas kiya hai. Sare ke sare social media par lekin akele ka pryas shayad paryapt nahi tha.

      Khair, agar aap thik samjjhen to is kuchh logon tak pahucha dijiyega. Mere liye kafi madad ho jaegi.

      Dhanyawad.
      Nilabh

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  2. Apka Upanyas Swayamwar Kahan Se Prapt Kiya Ja Sakta Hai?

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    1. Yukki Ji,

      Aap use Diamond Books ki site praprt kar sakte hain. Agar aap Delhi me hain to mujhse mil kar le sakte hain.

      Nilabh

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