Feb 21, 2017

बैंगलोर का वाकई कोई जवाब नहीं

आज मेरे साथ कुछ ऐसा घटा जिससे मेरी दृष्टि में बैंगलोर की महानता में एक और उपलब्धि जुड़ गयी। मैं आज किसी काम से विप्रो के इलेक्ट्रॉनिक सिटी ऑफिस में गया था जो मेरे घर से काफी दूर है। वापसी में एक छोटे सी दुर्घटना के कारण मेरे पैरों में थोड़ी चोट लग गयी। मैं काफी दूर से पैदल आ रहा था लेकिन चोट लगने के कारण आगे चलने में थोड़ी तकलीफ हुई। उस वक्त मैं विप्रो के गेट नंबर ११ पर था जहाँ से विप्रो बस स्टैंड महज ५०० मीटर की दूरी पर है। पहले मैंने एक ऑटो वाले से पूछा और जैसी कि मुझे उम्मीद थी, उसने आधे किलोमीटर चलने के लिए २०० रूपये माँगे। शायद उसे भी मेरी मजबूरी का पता चल चुका था। मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उसे क्या कहूँ? बहुत क्रोध आया लेकिन मैंने उससे कुछ कहा नहीं। जाते जाते वो कुछ मोल भाव करने लगा लेकिन उस समय तक मुझे उसके ऑटो में मुफ्त में भी जाने की इच्छा नहीं थी।

जैसे ही मैं आगे बढ़ा, एक व्यक्ति बाइक पर आया और मेरे पास रुक गया। वो Concentric Technology में काम करता था। मैंने उससे अनुरोध किया कि क्या वो मुझे अगले मोड़ तक छोड़ सकता है? उसने मुझे बिठा लिया और दो मिनट बाद मैं विप्रो बस स्टॉप पर था। मैंने उसका शुक्रिया अदा किया और जाने लगा कि अचानक उसने मुझसे ५० रूपये माँगे। एक पल को तो मुझे समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है? तुरंत ही मुझे समझ में आ गया कि वो मुझसे लिफ्ट देने की फीस मांग रहा है। मैं इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं था। मुझे जरा भी अपेक्षा नहीं थी कि एक पढ़ा लिखा व्यक्ति जो इतनी बड़ी कंपनी में काम करता है मुझसे लिफ्ट देने के पैसे मांगेगा। मेरे मुँह से सिर्फ इतना निकल "५० रूपये?" और उसने बड़ी शालीनता से जवाब दिया "हाँ बैंगलोर में यही रेट लगता है।"

मैं अवाक् था लेकिन बात बढ़ाना नहीं चाहता था। मैंने उसे १०० रूपये का नोट दिया और उसने इस प्रकार मुँह बनाया जैसे आजकल दुकानदार २००० का नोट देख कर बनाते हैं। वो लगभग सड़क के बीच में खड़ा था जिससे पीछे के वाहनों ने हॉर्न बजाना शुरू कर दिया। उसने जल्दी से जेब से १०-१० के तुड़े मुड़े नोट निकले और मेरे हाँथों में थमा दिया। इससे पहले कि मैं उसे गिनता, वो व्यक्ति तेजी से वहां से चलता बना। मैंने बाद में देखा, उसमे केवल ३० रूपये थे।

मुझे उस समय कितना गुस्सा आया मैं यहाँ बता नहीं सकता। उस समय वो तीस रूपये पकडे मुझे बहुत ही ज्यादा शर्म आ रही थी। गुस्से में मैंने वो तीस का नोट वही सड़क पर फेंका और वापस अपने घर की ओर चल दिया। पूरे रास्ते मैं केवल यही सोच रहा था कि आखिर आज ये हुआ क्या? यकीन मानिये इस पोस्ट को लिखते हुए भी मैं गुस्से से कांप रहा हूँ। 

मैंने सालों साल निकल दिए। इस देश के २७ राज्यों में रह और घूम चुका हूँ। सैकड़ों लोगों से लिफ्ट ली है लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। इतनी जगहों पर रहने के बाद भी लगता है जैसे बैंगलोर कोई अलग देश ही है। कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट शेयर किया था जिसमे मैंने बताया था कि कोलकता में मैंने राज्य सरकार की AC बस से सफर किया था जिसमे १९ किलोमीटर के लिए मुझे केवल ४५/- रूपये ही लगे थे और उसी १८ किलोमीटर के सफर के लिए मुझे बैंगलोर राज्य सरकार की AC बस में २६०/- रूपये लगे थे। इतना अंतर? आखिर किस लिए? क्या यहाँ की बसों में सोने चांदी की कुर्सियां है? ऐसी क्या खासियत है कि यहाँ पर जनता से दूसरे राज्यों की अपेक्षा ६-७ गुणा तक किराया वसूला जा रहा है? अगर आप घर लेने जायेंगे तो आपसे इतना पैसा मुँह खोल कर माँगते हैं जैसे पूरे देश में केवल उन्ही का घर किराये पर उपलब्ध है। उसके ऊपर १० महीने से लेकर १ साल तक का किराया सिक्योरिटी के रूप में भी चाहिए उन्हें। क्यों भाई? हम सभी इतनी मेहनत इसी कारण कर रहे हैं क्या कि आपकी जेबें भरते फिरें? इन सब के ऊपर से आज की घटना ने तो इस शहर के प्रति मेरी घृणा और बढ़ा दी है। लोग कहते हैं कि बैंगलोर इतना खूबसूरत शहर है। घंटा खूबसूरत है। उस खूबसूरती का हम लोग जैसे आम लोग अचार डालेंगे क्या? आखिर इतनी बेमतलब की महँगाई क्यों? जितनी जल्दी हो सके मैं इस नर्क से निकलना चाहता हूँ। अगर पेट का सवाल नहीं होता तो कब का ये शहर छोड़ चुका होता। यहाँ इमारतें महँगी हैं और इंसान सस्ते। 

बैंगलोर शहर की खूबसूरती देखने अवश्य आइये लेकिन साथ ही ये भी देखने की कोशिश कीजिये कि इस शहर में पैसे का कैसा बोलबाला है। पैसे के लिए इतना नीचे गिरने वाला शहर आपको पूरे भारत में ढूंढने में बड़ी मुश्किल होगी।

अंत में सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि बैंगलोर के निवासियों को शायद मेरी इन बातों से कष्ट पहुँच सकता है। लेकिन ईश्वर के लिए मेरी इस भावना को किसी व्यक्ति अथवा समुदाय से जोड़ने का प्रयास ना करें। जो भी उदगार निकला है वो पूर्ण रूप से मेरा अपना है।