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Wednesday, March 29, 2017

सर्विस टैक्स छूट की जमीनी हकीकत

कुछ दिनों से ये चर्चा बड़ी गर्म थी कि अब खाने के बाद सर्विस टैक्स देना अनिवार्य नहीं है। अगर आपकी इच्छा हो तो दें या ना दें। ये किसी भी आम आदमी के लिए बहुत बड़ी खबर थी।

साधारण सी बात है कि अगर आप अपने परिवार के साथ कही खाने जाते हैं और 1000 रूपये का बिल बनता है तो 15% सर्विस टैक्स के साथ 150 रूपये अतिरिक्त देने होते है। यही नहीं उस सर्विस टैक्स पर आपको 6% वैट भी देना होता है। यानि 9 रूपये। तो 1000 के कुल खर्च पर आपको 159 रूपये की अच्छी खासी रकम देनी पड़ती है। पता नहीं आपने ध्यान दिया है या नहीं पर कई रेस्टॉरेंट पूरे बिल पर वैट और सर्विस टैक्स अलग अलग काटते हैं। यानी 1000 रूपये पर 210 रूपये अतिरिक्त।

आजकल लोगों की आमदनी काफी तेजी से बढ़ी है और शायद इसी कारण हम सीधे टोटल को देखते हैं। मेरे जैसे कई व्यक्ति जिन्हें इससे चिढ भी होती है तो भी केवल इसी लिए चुप रह जाते है कि इतनी छोटी रकम के लिए कौन चिक चिक करे? यकीन मानिए यही छोटी छोटी चीजें एक दिन आपको सड़क पर ला सकती है। खैर टैक्स का विश्लेषण हम कभी और भी कर सकते हैं।

आज इस पोस्ट को लिखने का कारण कुछ और है। पिछले कई दिनों से मैने कई बार सोचा कि सर्विस टैक्स देने से मना करू और फिर देखूं कि उनकी ओर से क्या जवाब आता है लेकिन कर नहीं पाया। एक दिन निश्चय करके मैंने बैंगलोर के एक होटल में सर्विस टैक्स देने से मना कर दिया तो उन्हें जैसे फर्क ही नहीं पड़ा। बहस से बचने के लिए मैंने पूरा भुगतान किया। बैंगलोर से वैसे भी मेरा 36 का आंकड़ा है इसलिए मैंने ज्यादा सर नहीं फोड़ा लेकिन उसके बाद हैदराबाद, कोलकाता और अब भागलपुर में भी जब मैंने सर्विस टैक्स देने से मन किया तो सब ने किसी ना किसी रूप में मना कर दिया। भागलपुर में तो जवाब सबसे हास्यप्रद था। उनके हिसाब से सर्विस टैक्स को वैकल्पिक बनाने का निर्णय अभी तक भागलपुर पर लागू नहीं हुआ है। खैर...

अब सवाल ये है कि क्या वाकई ये नियम भारत सरकार की ओर से बनाये गए है? अगर हाँ तो क्या आपमें से कोई इसको सत्यापित कर सकता है? अगर ये नियम वाकई में हैं तो फिर भारत सरकार इसे किस प्रकार से मॉनिटर कर रही है? सबसे अहम् सवाल कि अगर कोई होटल इस नियम को मानने से इंकार कर देता है तो हमारे पास क्या विकल्प है? क्या उसकी शिकायत कही की जा सकती है?

इस सबसे पहले, टैक्स लेने का हिसाब किताब आखिर क्या है? जब हम खाना खरीदते है तो वो कोई डब्बाबंद तो होता नहीं जिसपर वैट (सेल्स टैक्स) लगाया जा सके। दूसरी बात अगर आप वैट लगा रहे हैं तो फिर आपको अपने सामान को बोचने के लिए सर्विस तो देनी ही होगी। फिर उसपर सर्विस टैक्स लगाने का क्या तुक है? अगर हम खाना केवल पार्सल करवा रहे हैं उस स्थिति में भी आप सर्विस तो कुछ दे नहीं रहे है फिर सर्विस टैक्स का भुगतान ग्राहक क्यों करे? और सबसे अजीब बात कि ये वैट और सर्विस टैक्स एक साथ लगाना कहाँ का पागलपन है?

क्या आपने से कोई और भी इस तरह की मनमानी का शिकार हुआ है? अगर हाँ, तो कृपया अपना अनुभव साझा कीजिये। पता तो चले कि आखिर ये हो क्या रहा है?

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