Dec 26, 2017

ये वाकई जरुरत है या आदत?

कल रात की बात है। खाना बाहर खाना पड़ा। खाते समय ध्यान गया एक दीन-हीन से दिखने वाले  वृद्ध भिखारी पर। बैंगलोर में आम तौर पर भिखारियों की वेश भूषा इतनी दयनीय नहीं होती पर उसे देखने से लगा जैसे बड़ी मुसीबत में है। मैं आम तौर पर भिखारियों को नजरअंदाज ही करता हूँ किन्तु इसे नहीं कर पाया। मैं खाते हुए उसे देख रहा था जो वहाँ उपस्थित हर एक से कुछ पैसे देने की गुजारिश करता हुआ मेरी ही ओर आ रहा था। मैं भी एक तरह से उसका इंतजार ही कर रहा था कि करीब आये तो कुछ मदद कर दूँ। जब वो मेरे निकट आया तो उसकी दशा को और करीब से देखने का मौका मिला। ह्रदय द्रवित हो गया। सोचा २-५ रूपये में इसका क्या होगा? कुछ और करना चाहिए इसके लिए। तो क्या करूँ? सोचा अधिक नहीं तो कम से कम इस गरीब की एक समय की भूख तो मिटा ही सकता हूँ। सोचा इससे अच्छा कुछ हो नहीं सकता। आखिर कोई भीख क्यों माँगता है? पेट के लिए ही ना? तो इसे भर पेट खाना ही खिला देना चाहिए। कुछ और नहीं तो जब आज अच्छा खाना खा के सोयेगा तो दिल से दुआ देगा।

तो जब तक वो मेरे पास आकर कुछ माँगता, मैंने दुकानदार से एक और थाली लगाने को कहा। जब तक खाना आता, वो भिखारी मेरे पास आ गया और हाँथ फैला दिए। मैंने उससे पूछा खाना खाओगे? उसने अजीब सी दृष्टि से मुझे देखा। शायद उसे हिंदी नहीं आती थी और मुझे कन्नड़ा। तो मैंने वही खड़े एक व्यक्ति से अनुरोध किया कि उसे कन्नड़ा में समझा दे कि आराम से बैठे क्योंकि उसके लिए खाना आ रहा है। उस व्यक्ति ने अपनी भाषा में मेरा सन्देश पहुँचा दिया। उस भिखारी ने वापस उस व्यक्ति से कन्नड़ा में कुछ कहा तो उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए मुझे बताया कि वो भिखारी खाना नहीं खाना चाहता बल्कि उसे ५ रूपये चाहिए। मुझे लगा कि शायद उसे ऐसा ना लगे कि मैं उसके लिए कोई बचा हुआ खाना मँगवा रहा हूँ मैंने उसे फिर से बैठने को कहा बताया कि अगर अभी भूख नहीं लगी हो तो खाना पैक करवा देता हूँ। जो व्यक्ति मेरे लिए अनुवाद का कार्य कर रहा था उसने भी उसे समझने की कोशिश की कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ पर उस भिखारी ने बड़ा अजीब सा मुँह बनाया और कुछ बड़बड़ाते हुए चलता बना। मैंने ये जानने की जहमत नहीं उठाई कि वो क्या कहता हुआ गया क्यूँकि इतना तो मुझे समझ आ गया कि वो कुछ अच्छा नहीं बोल रहा था।

मैं अवाक् था। ये जो कुछ भी हुआ उससे मैंने बड़ा अपमानित महसूस किया। एक सेकंड में मेरी सारी अवधारणाओं का किला ढह गया। क्या वो वाकई भीख इसलिए माँग रहा था कि उसे जरुरत थी अथवा उसे केवल नगद रुपयों में दिलचस्पी थी? मुझे ये समझ में नहीं आया कि आखिर क्यूँ ५ रुपया उसके लिए ८० रूपये के खाने से अधिक महत्वपूर्ण था। ये तो तय था कि उसे खाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। अगर होती तो खाना इस प्रकार छोड़ कर नहीं जाता। मैंने सोचा कि उस व्यक्ति को खाने के लिए पूछ कर मैंने कोई गलती कर दी। तभी दुकान के मालिक ने भी भी हँसते हुए कहा कि वो जनता था कि वो खाना नहीं लेगा चाहे उसे १००० रूपये का भी खाना मिल जाये क्यूँकि ५ रूपये नगद उसके लिए उससे बढ़ कर हैं। वो केवल नगद इसलिए लेगा क्यूंकि आपके दिए खाने से उसकी शराब की तलब नहीं मिटेगी। अब असली कारण क्या था, ईश्वर ही जाने। 

तो अगली बार अगर मेरे जैसा कोई व्यक्ति मिले जो भिखारियों को नजरअंदाज कर रहा हो तो कृपया गलत ना समझें। कोई भरोसा नहीं कि वो भी मेरी तरह ही भुक्तभोगी हो। पर इससे उन सैकड़ों गरीबों पर भी असर पड़ेगा जो वाकई भूखे हैं और मेरे जैसा कोई व्यक्ति इसी डर से उन्हें खाना ना खिला पाए। पर किया क्या जा सकता है? कैसे पता चले कि व्यक्ति वाकई भूखा है अथवा उसे भी केवल नगद पैसों की भूख है। खैर, अभी तो उस भिखारी के लिए मैं यही कह सकता हूँ कि "भगवान उसका भला करे।"