Jan 25, 2018

क्या पद्मावत का विरोध केवल रानी पद्मिनी के कारण है?

आज २५ जनवरी है। वैसे तो इस तारीख की कोई विशेष महत्ता नहीं है किन्तु इस वर्ष ये शायद सबसे महत्वपूर्ण दिन बन गया है। पिछले कई महीनों से संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म "पद्मावत" (जो पहले पद्मावती थी) का विवाद गहराता ही जा रहा है। इस फिल्म ने लगभग सारे कांड कर लिए। सबसे अधिक विवादित फिल्म बनने का गौरव हासिल किया, भंसाली को थप्पड़ खाने पड़े, अदृश्य पड़ी करणी सेना को चर्चित कर दिया और लगभग हर क्षेत्र में लोगों को दो गुटों में बाँट दिया। चुकि पहले ही इतना विवाद चल रहा था इसीलिए मैंने इसपर कुछ लिखा नहीं, हालाँकि लिखना बहुत पहले चाह रहा था किन्तु कल से जिस प्रकार की हिंसा भड़की है वो शर्मिंदा कर देने वाली है। हिंसा में जो नुकसान हुआ उससे ना करणी सेना को कोई फर्क पड़ा, ना सरकार को और ना ही भंसाली, दीपिका या रणवीर को जिनकी जेबें पहले से ही भर चुकी है। फर्क पड़ा आम इंसान को और आने वाले दिनों में और फर्क पड़ने की उम्मीद है। खैर इन सब पर चर्चा कभी और भी हो सकती है अभी फ़िलहाल हम अपने मुख्य विषय पर लौटते हैं।

मैं कई दिनों से सोच रहा था कि आखिर क्यों इस फिल्म को लेकर इतना हंगामा मचा हुआ है? क्यों राजपूत और करणी सेना ने इसे अपनी आन-बान-शान का मुद्दा बना रखा है? क्या ये सिर्फ इसलिए है क्युकि ये फिल्म रानी पद्मिनी पर आधारित है जो पुरे भारत, विशेषकर राजस्थान में बहुत सम्माननीय है या बात कुछ और है। व्यक्तिगत रूप से मुझे नहीं लगता कि केवल रानी पद्मिनी पर आधारित होने के कारण इतना बड़ा समुदाय इस फिल्म से खफा है। अगर ऐसा होता तो इससे पहले कई वीरांगनाओं और सम्माननीय व्यक्तित्वों पर फिल्म बन चुकी है, जिसपर कोई हंगामा नहीं हुआ। मेरे विचार में ये लड़ाई या वैमनस्य किसी किरदार को लेकर नहीं बल्कि जो व्यक्ति उस किरदार के साथ प्रयोग करने की कोशिश कर रहा है, उसको लेकर है। जी हाँ, मेरे विचार में इतना बवाल केवल रानी पद्मिनी के किरदार के कारण नहीं बल्कि संजय लीला भंसाली जैसे विवादस्पद निर्देशक के कारण है क्यूंकि लोगों को और मुझे भी ये बात का संशय है कि भंसाली जैसा निर्देशक रानी पद्मिनी जैसे सम्मानित किरदार के साथ न्याय नहीं कर सकता है। इसके साथ ही इसके कलाकार, विशेषकर दीपिका जो ऊट-पटांग बयान देने में माहिर हैं, इसका दूसरा कारण हैं। और मैं कोई हवा में बातें नहीं कर रहा बल्कि उसके पीछे ठोस वजह है। 

पिछले कुछ दिनों से कई मीडिया चैनल्स पद्मावत की बड़ाई करते नहीं थक रहे, या जिसे भंसाली ने व्यक्तिगत रूप से फिल्म दिखाई है और वे भंसाली के प्रवक्ता बने बैठे हैं। सवाल है कि फिल्म के सेंसर बोर्ड से पास होने से पहले किस अधिकार से इसका व्यक्तिगत प्रदर्शन किया गया? साथ ही साथ सोशल मीडिया पर एक वीडियो बड़ा प्रसिद्द हो रहा है जिसमे ये बताने की कोशिश की जा रही है कि रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी पर पहले भी एक डॉक्यूमेंट्री बन चुकी है तो उस वक्त इसका विरोध क्यों नहीं हुआ? लोग धड़ल्ले से १९८८ के कार्क्रम "भारत एक खोज" के एपिसोड नंबर २६ का हवाला दे रहे हैं जिसमे रानी पद्मिनी और अल्लाउद्दीन खिलजी की कहानी दिखाई गयी थी। इस तरह का तर्क देने वाले ये भूल जाते हैं कि वो समय भारतीय टेलीविज़न के इतिहास है स्वर्णिम युग था जब टीवी इन सास-बहु जैसे वाहियात बकवासों, नंगेपन और फूहड़ता से दूर, बहुत दूर हुआ करता था। निर्माताओं को अपनी जिम्मेदारिओं का अहसास था। रामायण और महाभारत जैसे बेहतरीन और मील का पत्थर माने जाने वाले कार्यक्रम बना करते थे। और जिस "भारत एक खोज" की बात लोग कर रहे हैं उसका निर्देशन श्याम बेनेगल जैसे उत्कृष्ट निर्देशक ने किया था जिनकी एक एक फ़िल्में भारतीय फिल्म इतिहास के नगीनों की तरह है। इसका निर्माण दूरदर्शन और प्रसार भारती ने किया था जो टी.आर.पी. जैसी फालतू चीजों से कोई सरोकार नहीं रखते थे। इसके अतिरिक्त खिलजी का किरदार ओम पुरी जैसे अभिनेता ने किया था जिनके विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। इसीलिए आजकल के शो की उस समय के कालजयी कार्यक्रमों से तुलना करने की मूर्खता करने से हमें बचना ही चाहिए। 

अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर। क्यों मैंने भंसाली और दीपिका पर सवाल उठाये? पहले भंसाली की बात करते हैं जो एक ऐसे निर्देशक हैं जिनका विवादों के साथ पुराना नाता रहा है या ये कहना भी गलत नहीं होगा कि विवादों में जबरदस्ती पड़ना शायद उनका शौक है। तथ्यों को तोड़ने-मड़ोड़ने में उन्हें महारथ हासिल है। एक निर्देशक के रूप में मुझे उनकी क्षमता पर कोई संदेह नहीं है और ना ही मैं इस बात से इंकार करता हूँ कि उन्होंने परिंदा और ख़ामोशी जैसी बेहतरीन फिल्मे भी बनाई हैं। लेकिन जब भी किसी ऐतिहासिक विषय की बात आती है तो ये श्रीमान अपनी हरकतों से बाज नहीं आते। ये वही भंसाली है जिसने चन्द्रमुखी और पारो को साथ नचवा कर देवदास जैसे उच्च कोटि रचना की आत्मा मार दी थी। शरतचंद्र जी के उपन्यास में एक भी ऐसा विवरण नहीं है जहाँ चन्द्रमुखी और पारो एक बार भी मिली हों। अगर आप १९५५ की बिमल रॉय निर्देशित देवदास देखेंगे तो पता चलेगा कि तथ्यों को किस तरह सम्मान देकर फिल्म बनाई जाती है पर भंसाली जी ने ना सिर्फ दोनों को मिलवाया बल्कि साथ-साथ नचवाया भी। और उस नाच की जो पृष्ठ्भूमि तैयार की गयी उसमे देवदासियों को एक प्रकार से लाँछन भी दिया गया। 

हाल में ही भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म "बाजीराव-मस्तानी" में भाई साहब ने फिर वही राग अलापा और मस्तानी एवं काशीबाई को एक साथ नचवा दिया। वास्तविकता में वे दोनों एक दूसरे से उतनी ही दूर थीं जितनी होना चाहिए। इसके अतिरिक्त ३ घंटे की पूरी फिल्म बाजीराव की वीरता और युद्ध सञ्चालन से इतर मस्तानी के साथ उनके प्रेम प्रसंग के ही इर्दगिर्द घूमती रही। अर्थात अगर आप भंसाली की मानें तो बाजीराव ने किस प्रकार मराठा साम्राज्य को शिखर पर पहुँचाया उसका कोई वर्णन ही नहीं था किन्तु किस प्रकार वो एक सफल प्रेमी के रूप में उभरे उसका ही चरित्र चित्रण हुआ। भंसाली का जब इससे मन नहीं भरा तो उन्होंने बाजीराव जैसे योद्धा को एक विफल प्रेमी की तरह अपनी प्रेमिका की याद में रोते-रोते मरते हुए दिखाया जो उन जैसे योद्धा के सम्मान पर एक बहुत बड़ा दाग था। बाजीराव की मृत्यु का कारण बल्कि इससे उलट था। यही नहीं, सिनेमा के नाम पर छूट लेते हुए उन्होंने बाजीराव और मस्तानी को एक साथ मरते हुए दिखा दिया जबकि मस्तानी बाजीराव के मृत्यु के बाद भी कई वर्ष जीवित थी। क्या सिनेमा आपको किसी व्यक्ति को समय से पहले मार देने की छूट भी देता है? इस फिल्म को भी इस प्रकार रिलीज़ नहीं होने दिया जाना चाहिए था पर शायद मराठों को अपनी आन उतनी प्यारी नहीं थी जितनी कि राजपूतों को है। और क्यों ना हो? जो व्यक्ति को इतिहास के तथ्यों के साथ छेड़-छाड़ करने का व्यसन हो उसके विरोध में अगर कोई अपनी संस्कृति के लिए जा रहा है तो इसमें गलत क्या है? मैं ये बात भी पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि पद्मावत के रिलीज़ से पहले जो "ड्रीम सीक्वेंस" की अफवाह उडी थी वो भी शायद सस्ती लोकप्रियता के लिए भंसाली द्वारा ही उड़ाई गयी थी। हालाँकि उनका ये दाव उल्टा पड़ गया और लेने के देने पड़ गए।

अंत में बहुत संक्षेप में फिल्म के कलाकारों पर आते हैं। ये वही दीपिका पादुकोण है जिसने पिछले साल ही xXx के रिलीज़ के समय कहा था कि वो विन डीजल के साथ अद्भुद बच्चे पैदा करना चाहती हैं। यही नहीं वो हर रात सपने में विन डीजल के साथ ही होती हैं। हम सबको पता है कि ये बात शायद सही ना भी हो पर केवल अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए अगर कोई इस हद तक गिर सकता है तो क्या किया जा सकता है। स्त्रियों के पहनावे पर कोई टिपण्णी करना उचित नहीं है क्यूंकि वो उनका निजी मसला है लेकिन आप खुद समझदार हैं। रणवीर सिंह के बारे में कुछ ना ही बोलू तो उचित है। उन्हें शोज़ में उलटी-सीधी हरकत करते सबने देखा है। शहीद कपूर को भी बीच में ला ही देते हैं। ये शाहिद कपूर वही हैं जो कुछ वर्ष पहले अपनी एक फिल्म "कमीने" की प्रमोशन के लिए एक लाइव टीवी शो पर बैठे हुए बच्चों से कई बार जोर जोर से कमीने कहलवाया था और इस घटना पर वहाँ बैठे तथाकथित बुद्धिजीवियों ने जमकर ठहाके लगाए थे। उस समय इन्हे अपनी जिम्मेदारी का ख्याल नहीं आया? रणवीर ने तो खैर अपनी छवि के अनुसार भूमिका निभाई है लेकिन दीपिका और शाहिद जैसे गैर-जिम्मेदाराना लोगों को राजपूत क्यों रानी पद्मिनी और रतन सिंह जैसे महान लोगों की भूमिका निभाते देखना पसंद करेंगे। 

फिल्मो को सिर्फ "लार्जर देन लाइफ" और भव्य दिखने से कही अधिक आवश्यक है किरदारों को जिम्मेदारी के साथ परदे पर उतरना। मैं ये विश्वास के साथ कहता हूँ कि अगर इसी फिल्म को हृषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी, बिमल रॉय या बीआर चोपड़ा जैसे निर्देशक बना रहे होते तो लोगों को विश्वास के साथ गर्व भी होता। पर अफ़सोस इन जैसे महान निर्देशक अब रहे नहीं और आज के ज़माने के जो जिम्मेदार निर्देशक है, उनके पास शायद एक फिल्म में लगाने के लिए उतना पैसा नहीं है। वैसे एक बात का फायदा तो हमें हुआ कि अब से कोई भी निर्देशक या निर्माता ऐतिहासिक विषयों से छेड़-छाड़ करने से पहले हजार बार सोचेगा। ये देश या संस्कृति के प्रेम के कारण नहीं, बल्कि इसीलिए कि आखिर करोडो डूबने का खतरा भी तो है।