Feb 7, 2018

फिल्म समीक्षा: पद्मावत - एक निहायती ही गैर-जिम्मेराना प्रयास

तो आख़िरकार पद्मावती रिलीज़ हो ही गयी। फिल्म को लेकर जो नौटंकी हुई वो किसी से छिपी नहीं है पर यहाँ मैं उसपर बात करने नहीं आया हूँ। वैसे मैं कभी फिल्म समीक्षा लिखता नहीं हूँ पर इस फिल्म के लिखना पड़ रहा है। मैं इस फिल्म का विरोधी था क्यूंकि मुझे पता था कि भंसाली जैसे निर्देशक इतिहास की ऐसी-तैसी किये बगैर तो रहेंगे नहीं। इसकी आशंका मैंने पहले ही अपने पिछले पोस्ट में जाता दी थी जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। अब थिएटर में जाकर फिल्म देखने का अर्थ तो भंसाली की कमाई में मदद करना होता। तो फिर कैसे पता किया जाये कि फिल्म का जो विरोध हो रहा है वो सही है या नहीं। बड़ी समस्या थी पर भला हो टोरेंट का जिससे फिल्म देखने का मौका मिला। फिल्म देख कर संतोष हुआ कि मैंने जो आशंका जताई थी वो गलत नहीं थी। कहने को बहुत कुछ है और लेख को भी छोटा रखना है। चलिए पहले ये जानते हैं कि भंसाली ने किस प्रकार जगह-जगह पर राजपूतों और हिन्दुओ को अपमानित करने की कोशिश की है।

  • फिल्म का डिस्क्लेमर देख के ही समझ आ जाता है कि आपको बेवकूफ बनाने की पूरी तैयारी कर ली गयी है। अरे भाई, अगर फिल्म की कहानी किसी घटना पर आधारित है तो साफ़-साफ़ बताओ ना। बात को घुमाने की क्या जरुरत है? सिर्फ काल्पनिक लिख देने से ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़-छड़ करने का लाइसेंस थोड़े ही मिल जाता है। यही काम मधुर भंडारकर ने पिछले साल किया था जब अपनी फिल्म "इंदु सरकार" के डिस्क्लेमर में ये बताया कि ये किसी से प्रेरित नहीं है जबकि सबको पता था कि ये फिल्म इंदिरा गाँधी और इमर्जेन्सी पर आधारित है। जब फिल्म बनाने में नहीं डरे तो बताने में क्यों हालत ख़राब हो जाती है?
  • वैसे तो असल कहानी एक तोते के द्वारा कही गयी है लेकिन वैसा फिल्म में नहीं दिखा सकते तो वास्तविकता के निकट रखना ठीक है। फिल्म की शुरुआत होती है जहाँ एक राजकुमारी (पद्मिनी/दीपिका) घने जंगल में शिकार कर रही है। नितांत अकेली। ना कोई अंग-रक्षक, ना कोई दास या दासी। शिकार करने के बाद शायद खुद के कन्धों पर हिरण को टाँग कर ले जाने का विचार था। खैर शब्द-वेधी बाण चलाया जो सीधे जाकर एक व्यक्ति (रतनसिंह/शाहिद) को लगा। भाई साहब भी नितांत अकेले। ना कोई अंग-रक्षक और ना ही दास। पता नहीं किस देश के राजा या राजकुमारी इस प्रकार अकेले निकल जाते हैं। खैर राजकुमारी उन्हें गुफा में ले जाती है। इतना सब होने के सिंघल देश की सेना रतनसिंह को ढूंढ़ने निकलती है तो राजकुमारी कहती है वो ठीक हैं। उसे ये बताना आवश्यक नहीं लगता कि भाई साहब को उन्होनें ही तीर मार कर गिरा दिया है। अब राजकुमारी राजा का इलाज और सेवा खुद करने लगती है। यहाँ भी नितांत अकेले। पानी भी पिलाती है तो बिलकुल कामुक मुद्रा में। राजा चौंकता है तो आवश्यकता से अधिक निकट जाकर सांत्वना देती है। आज कल के ज़माने में भी ये सब नहीं होता, पता नहीं तेरहवी शताब्दी में ये सब कैसे हो गया। खैर दोनों में प्रेम होता है और वे विवाह कर वापस मेवाड़ आ जाते हैं। मेवाड़ आते ही रानी पद्मिनी सब पर छा जाती है और फिर अन्य सभी गौण हो जाते हैं। 
  • अल्लाउद्दीन (रणवीर), जो जलाल्लुद्दीन (रजा मुराद) का भतीजा है, अफगानिस्तान में है। उसकी एंट्री भी एक शुतुरमुर्ग के साथ होती है (पता नहीं क्यों)। खिलजी कहता है कि शुतुरमुर्ग पकड़ कर बहुत बड़ा काम किया है इसलिए अपनी बेटी की शादी मुझसे कर दीजिये और जलालुद्दीन कर देता है। वहाँ बैठ कर वे दोनों दिल्ली पे कब्जे की बात करते हैं। खिलजी की शादी होती है और जिस दिन उसकी शादी होती है उस दिन वो किसी और औरत के साथ रंगरलिया मना रहा होता है। एक बंदा आता है और उसे समझाता है तो बस वो उसे मार देता है। पता नहीं इसे दिखने की क्या जरुरत थी? शायद खिलजी को ऐय्याश और खतरनाक दिखने के लिए। और यही सब करवाना था तो उसे इतनी शिद्दत से मेहरुनिसा (अदिति) से शादी करने की क्या जल्दी थी। खैर कोई लॉजिक मत ढूंढिए, है नहीं। 
  • इधर मेवाड़ में नाच-गाना और थोड़ा ड्रामा होता रहता है। रानी पद्मिनी को विदुषी दिखने के लिए राघव चेतन (रतनसिंह का गुरु) कुछ उल्टे-पुल्टे सवाल करता है जिसके उल्टे-पुल्टे उत्तर मिलते हैं जो दर्शकों की समझ से बाहर है। बरहाल, राघव चेतन दोनों के अंतरिम पलों को देखने की कोशिश करता है। पता नहीं कैसे, राजा के महल में, विशेषकर उसके कक्ष कोई सुरक्षा नहीं है। खैर वो पकड़ा जाता है और देश निकाला पाता है। 
  • जब आपको पता हो की फिल्म में २०० करोड़ लगे हैं तो आपको कुछ धमाकेदार देखने की उम्मीद होती है। बाहुबली उसका एक उदाहरण थी। पद्मावत में अचानक जलालुद्दीन दिल्ली पे कब्ज़ा कर लेता है। पता नहीं कैसे क्युकी किसी प्रकार का युद्ध नहीं दिखाया गया और आपको निराशा होती है। अब मंगोल उनपर आक्रमण करते हैं और खिलजी हीरो बनते हुए उनसे लड़ने जाता है। दोनों बहुत बड़ी सेना दिखाई जाती है जो एक भयानक युद्ध की शुरुआत लगती है। स्पेशल इफ़ेक्ट दिखाया गया है, धूल उड़ती है और खिलजी को छोड़ पूरी सेना लड़ने चली जाती है। खिलजी अकेला है बिना अंगरक्षक। थोड़ा फुटेज खाने के बाद उसका घोडा आगे बढ़ता है। दर्शक खुश हो जाते हैं कि युद्ध देखने के मिलेगा। खिलजी धूल में गायब होता है और जब निकलता है तो उसके हाथ में मंगोल राजा का सर होता है। लड़ाई खत्म और दर्शक ठगे से रह जाते हैं। खैर उसकी तरक्की हो जाती है और उसे एक सूबा मिल जाता है। वहाँ वो एक हिन्दू राजकुमारी को बाँध कर कुछ घटिया हरकतें करता है। इस सीन की क्या जरुरत थी समझ से बाहर है। मुस्लिम होती तो शायद भंसाली नहीं करवाता। खैर वहाँ जलालुद्दीन उससे मिलने आता है वो भी केवल अपने दो वजीरों के साथ। कोई सेना या अंगरक्षक नहीं। लेके आता है मालिक काफूर (जिम) को। खिलजी काफूर को कहता है कि वजीरों को मार दो। वो मार देता है। मतलब जो दो वजीर जलालुद्दीन लेके आया था वो भी सिर्फ इसलिए कि काफूर उनकी ऐसी-तैसी कर सके। उसके बाद खिलजी जलालुद्दीन को मार देता है और अगले पल उसका सर लेकर दिल्ली में दिखता है। पता नहीं सर से क्या दुश्मनी है भंसाली की। शायद खिलजी को खूंखार दिखने के लिए पर परदे पर ये हद से अधिक नाटकीय लगता है। 
  • दिल्ली में राघव चेतन आता है और तुरंत खिलजी को मेवाड़ पे आक्रमण के लिए मना लेता है। भाई साहब सेना लेके मेवाड़ पहुँच जाते हैं और किले के बाहर घेराबंदी डाल देते हैं। वैसे तो मालिक मुहम्मद जायसी ने करीब महीने भर की घेरा-बंदी की बात की है पर फिल्म में इस समय-सीमा में दीवाली भी मन जाती है और होली भी। भंसाली ने यहाँ भी हिन्दुओं को नीचा दिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। एक तरफ दिखाया गया है कि खिलजी की सेना के मुस्लिम वीर अपने झंडे तक को गिरता नहीं देख सकते पर उधर मेवाड़ के किले में गोरा जैसे महावीर को रतनसिंह के साथ चिंता में डूबा दिखाया गया है। राजपूती डायलॉग तो बड़े-बड़े बोले जाते हैं लेकिन भंसाली ने पूरी कोशिश की है कि खिलजी की सेना इक्कीस लगे। एक कमाल की बात ये है कि पूरी फिल्म में कहीं पर भी खिलजी के झंडों का रंग पूरा हरा नहीं दिखाया गया है। हर जगह वो ग्रेस्केले में है। शुक्र है भंसाली ने चाँद-तारा गायब नहीं कर दिया। पहले लगा शायद तकनीकी खराबी होगी लेकिन फिर हिन्दुओं के सुर्ख केसरिया रंग को फिल्म में देख कर पता चला कि ये तो किसी विशेष समुदाय के संतोष के लिए किया गया है।
  • खिलजी सेना पीछे हटाने की बात करता है और रतनसिंह से मिलता है। वहाँ भी भंसाली की पूरी मेहनत खिलजी को श्रेष्ठ दिखाने में लगी है। शायद उसने शाहिद कपूर का चयन भी इसी कारण किया हो। वैसे भी हर जगह यही चर्चा है कि शाहिद को इस रोल के लिए क्यों चुना गया। बात उनके अभिनय क्षमता की नहीं है पर अभिनय तो राजपाल यादव भी बढ़िया करते हैं पर उन्हें एक योद्धा की तरह नहीं दर्शाया जा सकता। खैर जब खिलजी किले में आता है तो कुछ ड्रामा होता है। पद्मावती की झलक देखने का अनुरोध ठुकराने के बाद ये बिलकुल साफ़ नहीं किया गया है कि क्यों पद्मावती स्वयं खिलजी के सामने जाने को तैयार होती है। जो दुविधा या खतरा ऐसी परिस्थिति में होना चाहिए वो बिलकुल नहीं दिखती। लगता है जैसे पद्मावती को स्वयं को दिखने की जल्दी है। ऐसा माहौल भंसाली जैसा डायरेक्टर की रच सकता है। शुक्र है कि पद्मावती को दिखने वाला सीन क्षणिक है और इसे खींचा नहीं गया है। यहाँ भंसाली ने या तो संवेदनशीलता से काम लिया है या उसे वो थप्पड़ याद रहे जो राजस्थान में मिले थे। आगे भंसाली की कल्पना का उत्तम नमूना मिलता है। खिलजी रतनसिंह को भोजन का आमंत्रण देता है। जाना जरुरी नहीं था, इसपर पद्मावती की जरुरत से अधिक चिंता भी दिखाई गयी है पर वही राजपूत आन के लिए रतनसिंह ४-५ लोगों के साथ खिलजी के शिविर में जाते हैं। उनके अंगरक्षक बाहर रुकते हैं और रतनसिंह अंदर चले जाते हैं। छोटा सा तम्बू है और बिलकुल खाली है। खिलजी अकेला बैठा है। यहाँ पर भी भंसाली ने खिलजी से ऐसे संवाद बुलवाये हैं जो उसकी भूमि के प्रति संवेदनशीलता दिखलाते हैं। अचानक पता नहीं कहाँ से १०-१५ सैनिक आ जाते हैं और रतनसिंह को अपहृत कर ले जाते हैं। यहाँ भी भंसाली ने राजपूतों को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। रतनसिंह जैसा राजपूत, बिना किसी विरोध के चुप-चाप उनके साथ चला जाता है। और २० लोगों के आने जाने का पता उस छोटे से तम्बू के सामने खड़े गोरा और बादल जैसे वीरों को चलता ही नहीं। भंसाली ये बताने की पूरी कोशिश करते हैं कि रतनसिंह इतना मुर्ख है कि एक राजा होते हुए भी उन्हें इस बात की गंभीरता का कोई ज्ञान नहीं कि किसी राज्य के राजा का अपहरण इसके राज्य को किन मुसीबतों में डाल सकता है। ये भी बताने की कोशिश की गयी है कि रतनसिंह कायर है जिसके मुँह से विरोध का एक बोल भी निकला वो भी तब जब उसके अंगरक्षक उसके बिल्कुल समीप उपस्थित है। हालांकि जायसी के काव्य के अनुसार जिस समय रतनसिंह का अपहरण हुआ, गोरा और बादल उनके साथ नहीं थे पर भंसाली तो भंसाली है। 
  • रतनसिंह के अपहृत होने के बाद पद्मिनी रण-चंडी बन जाती है। उसके अदम्य साहस का परिचय दिया है भंसाली ने। किस प्रकार? उसे दिल्ली भेज कर। यहाँ भी भंसाली ने इतिहास और जायसी के काव्य की ऐसी-तैसी कर दी है। इतिहास के अनुसार रानी पद्मिनी कभी दिल्ली गयी ही नहीं। उन्होंने गोरा और बादल को इसकी सूचना और वे दोनों सेना के साथ रतनसिंह को छुड़ा कर लाये। फिल्म में सब पद्मिनी को समझाते हैं कि दिल्ली ना जाये पर भंसाली ने कह दिया तो कह दिया। यहाँ एक बार फिर भंसाली ने राजपूतों को नीचे दिखाया है। अपनी आन पर मर मिटने वाले राजपूत रानी पद्मिनी के साथ मिल कर ये योजना बनाते है कि मुगलो पर आक्रमण तब करें जब वे नमाज पढ़ रहे हों। क्या कोई राजपूत इस प्रकार की कायरता कर सकता है? पर भंसाली के मुग़ल प्रेम ने ये भी कर दिखाया जैसे अगर वे सचेत होते तो राजपूत उनके सामने टिक नहीं पाते। पर चिंता ना करें, राजपूतों का अपमान अभी और भी है। इतिहास के अनुसार ८०० डोलियाँ (कही कही १००० का भी वर्णन है), जिसमे राजपूत योद्धा थे, दिल्ली गयी थी पर भंसाली ने यहाँ पैसा नहीं खर्च किया और ५०-१०० डोलियों को दिखा कर औपचारिकता पूरी कर दी। उधर खिलजी को मारे ख़ुशी के खल्ली-बल्ली गाने पर नचवा भी दिया गया है। वे लोग दिल्ली पहुँचते हैं और रतनसिंह से मिलते हैं। यहाँ पर भी भंसाली की दूरदृष्टि देखिये। खिलजी की पत्नी उन्हें चोरी छुपे बाहर निकलती है। लेकिन ये काफी नहीं। निकलने से पहले रतनसिंह शेर की तरह अकेला खिलजी से मिलने जाता है, दो चार डायलॉग मरता है और फिर वापस खिलजी की बीवी के सहयोग से चोरी छुपे सुरंग से निकल जाता है। उसके निकलने के बाद गोरा और बादल मुगलों से लड़ते हैं और शहीद हो जाते है। जिन गोरा-बादल ने अपनी अदम्य वीरता और साहस से रतनसिंह को मुगलों के चंगुल से छुड़ाया और अपने प्राणों की आहुति दी, उनकी वीरगति को भंसाली ने कोई महत्त्व नहीं दिया। जबकि जायसी के काव्य में इन दोनो के वीरता के किस्से भरे पड़े हैं।
  • आखिर में खिलजी मेवाड़ पर आक्रमण करता है। यहाँ पर भी भंसाली की खुजली समाप्त नहीं हुई और उसने रतनसेन और खिलजी के बीच द्वन्द युद्ध को दिखा दिया जिसमे रतनसिंह की मृत्यु हो जाती है। ये नौटंकी वास्तविकता से बहुत दूर है। इतिहास के अनुसार खिलजी के मेवाड़ पहुँचने के पहले ही रतनसिंह की मृत्यु कुम्भलनेर के राजा देवपाल से युद्ध करते हुए हो जाती है। उनकी मृत्यु के पश्चात खिलजी वहाँ पहुँचता है इससे बचने के लिए रानी पद्मिनी को १६००० महिलाओं के साथ जौहर करना पड़ता है। फिल्म में रतनसिंह की मृत्यु के बाद खिलजी की सेना महल में घुसती है और रानी पद्मिनी अन्य महिलाओं के साथ जौहर करती है। इतने संवेदनशील सीन को भी भंसाली अति नाटकीय बनाने से नहीं चूके। खिलजी अकेला तलवार लेके किले में घुसा है और पागलों की तरह रानी पद्मिनी के पीछे भाग रहा है। बिलकुल रानी से पहुँचने से पहले जौहर कक्ष का द्वार बंद कर दिया जाता है। यहाँ पर भी १०० महिलाओं को दिखा कर भंसाली ने खानापूर्ति कर दी है क्योंकि १६००० दिखने में वी ऍफ़ एक्स का खर्चा बढ़ जाता। वास्तविक इतिहास देखें तो खिलजी के किले में घुसने से पहले रानी पद्मिनी और अन्य महिलाओं ने जौहर कर लिया था। 
अभिनय के मामले में भी फिल्म गोल है। पता नहीं लोग और बिकी हुई मीडिया सभी के, विशेषकर रणवीर के अभिनय की इतनी तारीफ क्यों कर रहे हैं? रणवीर ने अभिनय के नाम पर वो सारी बकलोल हरकतें की जो हमेशा करता है। इससे अच्छी अदाकारी उसने अपनी पहले की फिल्मो में की है। दीपिका एंग्री-यंग-वुमन दिखने के चक्कर में उलझ गयी हैं। पीकू में उनका अभिनय इससे कही अधिक शानदार था। शाहिद, जैसा बताया कि इस किरदार के लिए गलत चुनाव थे, फिर भी उनके अभिनय में रणवीर से अधिक ठहराव है। अदिति के पास करने को कुछ खास था नहीं। इन सबसे अधिक प्रभाव तो छोटे रोल्स में काफूर के रूप में जिम, राघव चेतन का किरदार निभा रहे अभिनेता और रजा मुराद  छोड़ते हैं। जो लोग भव्य युद्ध या वी ऍफ़ एक्स देखने की लालसा से जा रहे हैं वो पक्का निराश होंगे। पता नहीं २०० करोड़ कहाँ खर्च किये गए। 

अंत में मुद्दे पर आते है। लोग, खासकर बॉलीवुड और बिकी हुई मीडिया के लोग कह रहे हैं कि भंसाली ने इतिहास के साथ कोई तोड़-फोड़ नहीं क्या है और राजपूतों की शान बढ़ाई है। सत्य तो ये है कि भंसाली ने इस फिल्म से हर मोड़ पर इतिहास के साथ अन्याय किया है। एक तरफ रानी पद्मिनी और यहाँ तक कि उनकी दसियों तक को देशभक्त बताया और वही रतनसिंह की बड़ी रानी को एक वैम्प की तरह पेश किया। हर पल छोटे-छोटे प्रतीकों से हिन्दुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ किया। पूरी फिल्म में खिलजी जैसे राक्षस का महिमा-मंडन किया। खिलजी के काफूर के साथ समलैंगिक सम्बन्ध थे ये जग जाहिर है लेकिन भंसाली हमेशा इस बात का बचाव करते रहे। आखिर ये फिल्म राजपूतों, रतनसिंह और रानी पद्मावती के लिए बनायीं थी या खिलजी को महान दिखने के लिए? 

ये फिल्म पूरी तरह से औसत से भी नीचे की गुणवत्ता की है। एक बात तो पक्की है कि अगर फिल्म को लेकर इतना विवाद नहीं होता तो शायद ही ये फिल्म १०० करोड़ तक भी पहुँच पाती। इस फिल्म के पैसे वसूलने के लिए जान बूझ कर इतना विवाद फैलाया गया, दंगे जैसा माहौल बन गया, हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न उठा, आगजनी हुई, सरकारी समत्तियों को नुकसान पहुँचा, करनी सेना जैसे संगठन का भला किया गया और मीडिया ने मिठाई तो खायी ही होगी। राजस्थान में भंसाली के साथ बहुत बुरा हुआ। उसे सिर्फ एक थप्पड़ मार कर छोड़ दिया गया जबकि ऐसी वाहियात फिल्म बनाने के लिए उसे जूतों से पीटना चाहिए था। और गुस्सा सिर्फ भंसाली पर नहीं है बल्कि इस देश की मीडिया जिस गैर-ज़िम्मेराना तरीके से खबरें दिखती है, उनसे भी है। बॉलीवुड वाले तो खैर अपनी इंडस्ट्री का सपोर्ट करेंगे ही। मुझे नहीं लगता की मेरी इस समीक्षा के बाद मुझे इस फिल्म को कोई स्टार देने की जरुरत है। लिखने को बहुत कुछ है लेकिन इस समीक्षा को लम्बा बनाना नहीं चाहता लेकिन सेंसर जैसी संस्थाओं से ये अवश्य पूछना चाहता हूँ कि सब कुछ का सर्टिफिकेट अगर मीडिया या करणी सेना जैसी संस्था देगी तो आखिर वे उस जगह बैठे क्यों है? सिर्फ अंत के "I" को निकलने के लिए?