Feb 28, 2018

गरिमापूर्ण मृत्यु से तमाशे तक

चार दिन पहले यानि २४ फरवरी की सुबह जब मैंने अचानक अपने व्हाट्सप्प पर श्रीदेवी की मृत्यु का समाचार देखा तो सहसा यकीन नहीं हुआ। लगा जैसे किसी ने मजाक किया है। वैसे भी इस तरह मजाक सोशल मीडिया पर आम हैं और आज से पहले भी कई बार हो चुके हैं। स्वयं चेक किया तो पता चला कि खबर सच्ची है। बड़ा दुःख हुआ। ये उनकी उम्र नहीं थी मृत्यु को प्राप्त होने की। हालाँकि मैं कभी उनका प्रशंसक नहीं रहा हूँ फिर भी इस बात से कभी इंकार नहीं किया जा सकता कि वो एक बेहतरीन अभिनेत्री थी। जैसा कि भारतीय मीडिया में आम है, पूरे दिन उन्ही के ऊपर न्यूज आते रहे है बड़े दिनों के बाद मैंने भी काफी देर तक न्यूज़ देखा। हम आम लोग है। काम-धंधे में व्यस्त हो गए। दूसरे दिन टीवी ऑन किया, श्रीदेवी जी ही थी। तीसरे दिन, चौथे दिन, हर जगह, हर समय। कई लोगों को शौक होता है एक ही चीज बार-बार देखने का लेकिन कितनी बार? 

पर इससे भी मुझे कोई समस्या नहीं है लेकिन इन चंद दिनों में मीडिया का जो रवैया रहा है वो वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है। लग रहा था कि देश में उनकी मृत्यु के अतिरिक्त कोई और घटना ही नहीं घटी है। हालाँकि उत्तर पूर्व राज्यों में चुनाव चल रहे हैं और दुखद है कि शंकराचार्य की भी मृत्यु हो गयी पर निश्चित हूँ कि इसके बारे में आपने कहीं टीवी पर नहीं सुना होगा क्यूंकि दिखाया ही नहीं गया है। दुर्भाग्य से उन्होंने विदेश में अपनी अंतिम साँस ली पर लगा जैसे भारतीय मिडिया को एक मौका मिल गया हो इस चीज को लम्बे समय तक खींचने का। मैं ऐसे ही भारतीय मीडिया को "भांड मीडिया" नहीं कहता हूँ। ज्यादा विस्तार में नहीं जाऊंगा लेकिन इस बार उन्होंने हर सीमा पार कर दी। ये देख के दुःख हुआ कि दूसरे दिन से ही मीडिया ने उनकी मृत्यु को हत्या के रूप में बताना शुरू कर दिया। कई तथाकथित बेवकूफ जासूसों को टीवी पैनल पर बैठ कर उनकी मृत्यु की गुत्थी सुलझाते हुए देख कर हँसी भी आयी। यहीं से शायद सोशल मीडिया में श्रीदेवी की मृत्यु एक मजाक बनना शुरू हो गयी। उनके जोक्स आने लगे, मीम्स बनने लगे, कुछ लोगों ने अवतार बता दिया तो कुछ ने शराबी, सही और गलत पर बहस होने लगी और आज जब मैं देखता हूँ तो लगता है उनकी मृत्यु पूरी तरह एक मजाक बन कर रह गयी है। या अगर में ये कहूं कि मजाक बना दी गयी है तो कुछ गलत नहीं होगा। मीडिया को इसने अधिकार दिया कि एक महिला जो एक गरिमापूर्ण विदाई की हक़दार हो, अपनी घटिया से भी घटिया हरकतों से ये संस्था उसका मजाक बना कर रख दे?

दूसरी ना पचने वाली बात कर दी महाराष्ट्र सरकार ने। अभी अचानक न्यूज पर नजर पड़ी तो श्रीदेवी को तिरंगे में लिपटा देखा। समझ नहीं आ रहा था कि कैसे रियेक्ट करूँ कि अचानक महाराष्ट्र पुलिस के दल पर नजर गयी जो पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें विदाई दे रहे थे। क्यों? किस आधार पर? किस योग्यता पर? तिरंगा और राजकीय सम्मान क्या इतना सस्ता हो गया है या कोई मजाक चल रहा है? उनके कुछ मुर्ख फैन ये तर्क दे रहे थे कि वो पद्मश्री थीं इसीलिए उन्हें ये सम्मान दिया गया। पढ़ कर बड़ी हँसी आयी। पद्मश्री!! क्या सचमुच? प्रतिवर्ष देश में करीब ५०० पद्म पुरस्कार दिए जाते हैं। पद्मश्री, पद्म-भूषण तो छोड़िये, कितने पद्म-विभूषण या भारतरत्न, जो किसी संवैधानिक पद पर ना हो, इस प्रकार का सम्मान मिलते आपने देखा है? देश का सैनिक जो सरहद पर शहीद होने के बाद इस तिरंगे को प्राप्त करता हो, उनके बलिदान को इस प्रकार अपमानित कैसे किया जा सकता है। इस पर भी लोगों की बड़ी नकरात्मक प्रतिक्रिया आयी है। पर करें क्या? पहले अकेले में चिल्ला कर भड़ास निकालना पड़ता था और आजकल सोशल मीडिया पर चिल्ला कर निकाल लेते हैं।

वैसे मैं तो अभी वो भी नहीं कर सकता। ७ तारीख से एक महीने तक सोशल मीडिया से विराम लिया हुआ है। आज बड़ा मन हुआ कि इसे फेसबुक पर डाल दूँ पर नहीं डाल सकता। खैर सौ बात की एक बात ये है कि एक व्यक्ति को ऊँचे आसन से घसीट कर गालिया पड़वाने वाले स्तर तक कैसे लाया जाता है वो भारतीय मीडिया से सीखना चाहिए। शायद इसीलिए भारतीय मीडिया को सबसे अविश्वासी मीडिया के ख़िताब से नवाजा जाता है। बेचारी श्रीदेवी भी ऊपर से ये सब देख कर हँस ही रही होंगी।